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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

१३४ • • हित चौरासी टिप्पणी-इस पद की वर्णना अन्य पदों से कुछ विलक्षण है। इस वर्णन में आदि से अन्त तक नायक एवं नायिका सर्वथा अनुकूल हैं और उस अनुकूलता में भी विलास की रमणीयता, सरसता एवं प्रियता की पराकाष्ठा हैं। जो लोग "नेति नेति वचनामृत" और "गौर श्याम भुज कलह मनोहर" में ही रस विशेष की सिद्धि मानते हैं वे- वे भुज पीन पयोधर परसत वाम दृशा पिय हार।' की झाँकी का अनुभव करें अपने भाव पूर्ण हृदय में। कितनी रस मयी है इसकी कल्पना ?

  • ३३ - अवतरण- आज प्रातः काल श्रीनन्द नन्दन एवं वृषभानु नन्दिनी उनींदे ही उठ पड़े हैं और निकुञ्ज के अन्तर्भाग में डगमगाते चरणों से प्रेम विक्षिप्त की सी दशा में किंवा सुरतालस पूर्ण खुमारी में डूबे वहीं भ्रमण कर रहे हैं। युगल की इस दशा का दर्शन-अवलोकन करके श्रीहित सजनी अपनी सखियों से उसका वर्णन कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन राजत जुगल किसोर। नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनींदे भोर॥ डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर। दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर॥ दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर। (जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर॥३३॥ भावार्थ- आज श्रीवृन्दावन में युगल किशोर यों शोभा पा रहे हैं कि नन्द नन्दन एवं श्रीवृषभानु नन्दिनी प्रातः काल ही उनींदे उठ पड़े हैं-रात्रि में पूरी तरह सो भी नहीं पाये (क्योंकि रति विहार के आनन्द ने मानों उन्हें सोने को कोई समय ही न दिया !) अतः चलते समय उनके चरण डगमगाते हैं और (गमन) गति भी शिथिल है। चलते हुए दोनों एक दूसरे को वसनाञ्चलों का-पट

हित चौरासी • • १३५ छोरों का अपने अपने नख चन्द्र से स्पर्श करते (-एवं आकर्षण करते हैं।) अधर क्षत विक्षत हैं, गण्ड मण्डल कज्जल से मण्डित है। ललाट पटल पर तिलक कुछ थोड़ा सा ही अवशेष रह गया है। अरुण नयन, जो चोर अलि-भ्रमर ही हैं केश राशि एवं उँगलियों के द्वारा छिपाये जाने पर भी नहीं छिपते -गोप्य रस पूर्ण रति विहार का प्रकाश किये ही दे रहे हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि सुरत समुद्र की झकझोर के कारण (आज दोनों को अपने अपने) तन एवं मन की भी सँभाल नहीं रह गयी है, (ऐसे रस मग्न हो रहे हैं!)

  • ३४ - अवतरण - श्रीवृन्दावन में विचरण करते हुए युगल किशोर कभी एक कुञ्ज से निकल कर दूसरी में प्रवेश करते हैं कभी एक गली से होकर दूसरी में जाते हैं। कभी-कभी अत्यन्त सङ्कीर्ण लता विटपाच्छादित कुञ्जों से होकर निकलते समय पट वस्त्रों के उलझने की पूर्ण आशङ्का होने पर भी वे नहीं उलझ पाते कुछ कुशल कला से निष्क्रमण कर जाते हैं। गलवहिया देकर चलते हैं तो सही पर दो हैं ऐसा भी प्रतीत नहीं हो पाता। वन विहार के उपरान्त रात्रि को सुख मय सुरत विहार की क्रीड़ा का आनन्द वितरण करते हैं और इससे समस्त सहचरि समाज को किसी अनिर्वचनीय सुख में मानो डुबा देते हैं किंवा केलि वारिधि की अमृत लहरियों से भिंगा देते हैं। इसी वन विहार एवं रसमय सुरत विहार सुख का साङ्केतिक वर्णन श्रीहिताचार्य चरण अपने स्वस्वरूप (सखी भाव) के अनुसन्धान पूर्वक इस प्रकार करते हैं- देव गंधार मूल- वन की कुंजनि कुंजनि डोलनि। निकसत निपट साँकरी बीथिनु, परसत नाँहि निचोलनि।।

१३६ • • हित चौरासी प्रात काल रजनी सब जागे, सूचत सुख दृग लोलनि। आलसवंत अरुन अति व्याकुल, कछु उपजत गति गोलनि॥ नर्त्तनि भृकुटि वदन अंबुज मृदु, सरस हास मधु बोलनि। अति आसक्त लाल अलि लंपट, बस कीने बिनु मोलनि॥ विलुलित सिथिल स्याम छूटी लट, राजत रुचिर कपोलनि। रति विपरित चुंबन आलिंगन, चिबुक चारु टक टोलनि॥ कबहुँ श्रमित किसलय सिज्या पर, मुख अंचल झकझोलनि। दिन हरिवंश दासि हिय सींचत, वारिधि केलि कलोलनि॥३४॥ भावार्थ – अहह ! कितना विलक्षण है युगल किशोर का वन की कुओं कुओं का विहरण ? यद्यपि अत्यन्त सङ्कीर्ण (लता सघन) गलियों से होकर निकलते हैं फिर दोनों के निचोल वस्त्रों का लताओं से स्पर्श तक नहीं हो पाता (ऐसे एकमेक हो जाते हैं परस्पर में सँट कर चलते हुए !) आज दोनों सारी रात जागते ही रहे हैं जिसकी सूचना अब प्रातः काल इनके लोल लोल लोचनों से प्राप्त हो रही है जो दृग आलस्य मय, अरुण और अति व्याकुल हैं और नेत्र गोलक भी किञ्चित किञ्चत् गति उत्पन्न करते हैं, नेत्रों की पलकें शिथिल हैं- भार से झँपी हुई हैं। भृकुटियों में नर्त्तन है और वदन कमल में सरस हास के साथ हैं मधुर मधुर वचन। अतः सिद्ध है कि अत्यन्त आसक्त एवं लम्पट भ्रमर श्रीलालजी को श्रीप्रियाजी ने विना मोल के ही वश में कर रखा है- अपना वशवर्त्ती कर रखा है। रुचिर कपोलों पर बिखरी हुई काली शिथिल केश माला शोभा पा रही है।

हित चौरासी • • १३७ कभी विपरीत रति का विलास है, तो कभी चुम्बन, तो कभी आलिङ्गन ही और कभी चारु चिबुक का प्रेम पूर्ण उचकाव ही कभी कभी युगल किशोर रति विहार से श्रमित होकर किशलय शय्या पर पौढ़ ही जाते हैं और परस्पर में एक दूसरे के वदन पर अपने अपने वसनाञ्चलों से झकझोलन करने लगते वयार डुलाने लगते हैं। इस प्रकार दिन प्रति-निरन्तर 'हरिवंश दासी' के हृदय को अपने केलि वारिधि की लहरियों से सींचते ही रहते हैं। – ३५ – अवतरण – नव नव प्रभा मण्डित श्रीवृन्दावन धाम है। प्रातः काल का पुनीत समय है। साँवन की सुहावनी ऋतु है। सर्वत्र श्रीवन में हिण्डोल पड़े हैं। रस सने युगल किशोर मन चाहे हिण्डोलों में चढ़कर झूलते हैं। कभी वन हिण्डोल से झूलते हैं, तो कभी रति हिण्डोल रंग। श्रम से जनित चिह्न श्रीमुख पर प्रकट हो आते हैं जो रात्रि के विहार हिण्डोल की मानो सूचना सी देते हैं। अस्तु; श्रीहित सखीजी अपनी अन्तरङ्ग सखियाँ ललिता विशाखा आदि के साथ इस हिण्डोल विहार का सुख दर्शन करतीं और आनन्द में भर कर रस विहार की प्रशंसा करती हुई कहती हैं– देव गंधार मूल–झूलत दोऊ नवल किसोर। रजनी जनित रंग सुख सुचत अंग अंग उठि भोर।। अति अनुराग भरे मिलि गावत सुर मंदर कल घोर। बीच बीच प्रीतम चित चोरति प्रिया नैन की कोर।। अबला अति सुकुमारि डरत मन वर हिंडोर झँकोर। पुलकि पुलकि प्रीतम उर लागति दै नव उरज अँकोर।। अरुझी विमल माल कंकन सौं कुंडल सौं कच डोर। वेपथ जुत क्यों बनै विवेचत आनँद बढ्यौ न थोर।। निरखि निरखि फूलतिं ललितादिक विवि मुख चंद चकोर। दै असीस हरिवंश प्रसंसत करि अंचल की छोर।।३५।।

१३८ • • हित चौरासी भावार्थ—(आज) दोनों नवल किशोर (हिण्डोल) झूल रहे हैं। उठने पर प्रातः काल अङ्ग-अङ्ग से रात्रि जनित आनन्द सुख की व्यञ्जना-सूचना सी हो रही है। दोनों अत्यन्त अनुराग से भरे हुए कभी मंद मधुर तो कभी तार(उच्च) मधुर स्वर में गान करते हैं। बीच बीच में श्रीप्रियाजी अपने नयन कोरों से प्रियतम के चित्त की चोरी भी करती जाती हैं। श्रेष्ठ हिण्डोल की लम्बी झंकोरों (झूलों) से अत्यन्त सुकुमारी अबला श्रीराधा का मन डर जाता है तब वे बार-बार रोमाञ्चित हो होकर और मानो अपने नव उरोजों की भेंट (अँकोर) सी देकर प्रियतम के हृदय से डर के मारे चिपट-लिपट जाती हैं। तरल हिण्डोल की झूलों में प्रियतम के उर की विमल माल प्रिया के कङ्कण से और प्रिया की कच डोर प्रियतम के कुण्डलों से उलझ गये। उलझ तो गये पर अब तरल हिण्डोल में यह उलझन सुलझायी कैसे जा सकती है ? इस उलझन में थोड़ा नहीं अपितु अत्यधिक आनन्द बढ़ा। हिण्डोल पर शोभित नवल युगल किशोर के पारस्परिक युगल चन्द्रमुख और युगल क्यों चतुः चारु चकोरों को देख-देखकर ललिता आदि सखियाँ प्रसन्न हो रही हैं और 'हरिवंश' भी (वलिहार भाव से) सम्मुख अञ्चल तटी करके युगल को आशीष देते और प्रशंसा कर रहे हैं। – ३६ – अवतरण – यमुना के परम पावन पुलिन पर आज रसिक शेखर श्रीलालजी ने रास रस की सरस आयोजना की है। उस रास में किशोरी श्रीराधा के सहित समस्त सहचरियाँ नृत्य गान एवं वाद्य में समान रूप से भाग ले रही हैं। यदि नृत्य परायण हैं, तो कोई उच्च स्वर से गान होकर रही हैं और कोई वाद्य वादन प्रवीण सखियाँ बाजे ही बजा रही हैं। समस्त युवति मण्डल के बीच विराजमान (मध्यवर्ती) श्रीलालजी अपने सुललित कण्ठ से सारङ्ग राग आलाप रहे हैं और श्रीवृषभानु किशोरी उसी राग के अनुसार सुधङ्ग नामक नृत्य गति का प्रदर्शन कर रही हैं। इस अलौकिक आनन्द को देख कर सुर नायक-इन्द्रराज फूल उठते हैं और पुष्प वृष्टि करने लगते है।

हित चौरासी • • १३६ श्रीहित अलि जी इस शारदीय महारास का मधु मय वर्णन अपनी निज सखियों को सुना रही हैं- सारँग मूल-आजु बन नीकौ रास बनायौ। पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट मोंहन बैंनु बजायौ।। कल कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि खग मृग सचु पायौ। जुवतिनु मंडल मध्य स्याम घन सारँग राग जमायौ।। ताल मृदंग उपंग मुरज डफ मिलि रससिंधु बढ़ायौ। विविध विशद वृषभानु नंदिनी अंग सुधंग दिखायौ।। अभिनय निपुन लटकि लट लोचन भृकुटि अनंग नचायौ। ताता थेई ताथेई धरत नौतन गति पति ब्रजराज रिझायौ।। सकल उदार नृपति चूडामनि सुख वारिद वरषायौ। परिरंभन चुंबन आलिंगन* उचित जुवति जन पायौ।। वरसत कुसुम मुदित नभ नाइक इंद्र निसान बजायौ। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति जस वितान जग छायौ।।३६।। भावार्थ-यमुना तटवर्त्ती सुन्दर एवं पवित्र पुलिन पर मोहन ने वेणु बजायी है और उन्होंने सुन्दर रास की रचना की है। रास में कङ्कण किङ्किणि एवं नूपुरों की मधुर मधुर ध्वनि को सुनकर खग मृग सभी सुख प्राप्त कर रहे हैं। युवति मण्डल के मध्य में विराजित श्याम घन ने (मुरली में) सारङ्ग राग जमाया है और उस स्वर से मिलकर बजते हुए ताल वाद्य मृदङ्ग, उपङ्ग, मुरज एवं डफ आदि रस समुद्र का विवर्द्धन कर रहे हैं। (रासोन्मत्त होकर) श्रीवृषभानु नन्दिनी जू ने अनेकों प्रकार से अपने विशद अङ्ग -सुधङ्ग का दिग्दर्शन कराया है। तथा उन अभिनय निपुण (श्रीप्रियाजी) ने लटक के साथ, ललित लोचनों को *'आलिङ्गन' और 'परिरम्भन'-चूँकि ये दोनों ही शब्द एक सा अर्थ रखते हैं तथापि यहाँ दोनों का प्रयोग विशेष विशेष अर्थों में किया गया है अर्थात् आलिङ्गन से साधारण भाव पूर्वक भेंट का अर्थ लेना चाहिये और परिरम्भण से अत्यन्त गाढ़ प्रीति के आलिङ्गन-भेंट से।

१४० • • हित चौरासी फेरते हुए अपनी भृकुटियों के नर्त्तन से कामदेव को भी नचा दिया- (लज्जित करके थकित कर दिया ।) साथ साथ तत्ता थेई, ता थेई' इन रास नृत्य सञ्चालक शब्दों के उच्चारण पूर्वक नृत्य की नव नव गतियों को लेती हुईं प्रियतम ब्रजराज किशोर को भी उन्होंने रिझा लिया, तब समस्त उदार नृपतियों के भी चूड़ामणि (श्रीलालजी) ने सुख वारिद की मानो वृष्टि सी कर दी। वह क्या वृष्टि की ? यह कि उन्होंने अपने प्रेम भाव का दान-आलिङ्गन, चुम्बन,; एवं परिरम्भण यथोचित रूप से समस्त युवति वर्ग को दिया किंवा उन युवतियों ने प्राप्त किया। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि इस आनन्द को देखकर नभ नायक इन्द्र राज पुष्प वृष्टि करते हुए दुन्दुभि बजा रहे हैं। इस प्रकार रसिक श्रीकृष्ण राधापति एवं श्रीराधा का यश वितान समस्त जगत् (विश्व) में छा गया। टिप्पणी-आलिंगन चुंबन परिरंभन उचित जुवति जन पायौ - श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के रस सिद्धान्त के अनुसार श्रीराधा नवल किशोरी ही एकमात्र प्रियतमा हैं श्रीलालजी की; अन्य नहीं। ये नित्य विहारी श्रीराधा के अनुकूल एवं स्वाधीन पति हैं, बहुनायक नहीं। परिकर की अन्य सखियाँ दासियाँ हैं जो श्रीलालजी में प्रियतम भाव रखती हुईं सेवा की ही मात्र अधिकारिणि हैं। वे रस विलास साहायिका अवश्य हैं पर भोग्य-भोक्ता सम्बन्ध तो केवल युगल किशोर तक ही सीमित है। युगल के मिलन, भोग एवं समस्त सुखों का आयोजन करना ही सखियों का पूर्ण सुख है, क्योंकि सखियाँ पूर्णतया तत्सुखित्व भाव की प्रति मूर्त्ति हैं। किन्तु आज महारास के सुखोत्सव में सखियों ने रसिक प्रियतम श्रीलालजी की स्वेच्छा से (अपनी आकाङ्क्षा से नहीं) आलिङ्गन, चुम्बन, परिरम्भण, भ्रूकटाक्ष स्पर्श, हास आदि जाने कितने प्रकार से सुख प्राप्त किये हैं, अथवा उन्हें श्रीरसिक शेखर ने दिये हैं। श्रीकृष्ण एवं सखियों के इस दान सम्मान से उदार हृदया श्रीराधा सर्वेश्वरी स्वामिनी संतुष्ट हैं, सुखी हैं और उल्लसित हैं। वे अन्य अन्य सुरत दुःखिता नायिका की भाँति व्याकुल नहीं है। क्योंकि वे जानती हैं कि ये सखियाँ भी तो मेरा ही स्वांश रूपा हैं अतः स्वजन ही क्यों ? आत्मवत्

हित चौरासी • • १४१ अभेद रूपा हैं। इसीलिये इस महादान के अवसर में श्रीहिताचार्य चरण ने सावधानी पूर्वक विशेषण दिया श्रीलालजी के लिये- 'सकल उदार नृपति चूड़ामनि' अस्तु; सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण, उनके रास रस एवं श्रृंगार रस की लीलाओं एवं श्रीहिताचार्य द्वारा प्रकाशित श्रीकृष्ण रस सार में बहुत बड़ा अन्तर देखा पाया जाता है। देखिये; श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण गोपियों के जार-उपपति तथा अनेक नारी नायक (बहुनायक) हैं उनका उन गोपियों के साथ रस काव्य की पद्धति के अनुसार रमण भी होता है, जो उनके अनङ्ग वर्द्धन वेणु गान को सुन कर रास में आयी हैं१। उन आयी हुई गोपियों के साथ श्रीकृष्ण हँसी ठिठोली, भ्रू विक्षेप, अलक स्पर्श, नखाग्र घात, हास परिहास, वाहु प्रसार (गलवाहियाँ), परिरम्भण, चुम्बन आदि नर्म क्रियाओं का व्यवहार करके उनके चित्तों में अनङ्ग उद्दीपन भी करते हैं२। इसी प्रकार गोपियाँ भी उनसे मिलन के समय अभिलाष भाव से मिलती हैं और रमण के प्रति जैसी चेष्टाएँ प्रियतमा की होनी चाहिये वही सब करती भी हैं। (देखिये श्रीमद्भागवत स्कन्ध १० अध्याय ३२ श्लोक ४,५,६,७,८ एवं स्क० १० अ०३२ श्लोक ११,१२,१३,१४।) गोपियों के आगमन के पश्चात् अन्तर्धान हो जाने के कारण वे श्रीकृष्ण को उलाहना भी


१-देखिये- एवं शशाङ्कांशु विराजिता निशाः, स सत्यकामोऽनुरताबलागणः। सिषेव आत्मन्यवरुद्ध सौरतः सर्वाः शरत्काव्य कथा रसाश्रयाः।। -श्रीमद्भा० १०/३३/२६ २. देखिये- बाहुप्रसार परिरम्भ करालकोरु- नीवीस्तनालभननर्म नखाग्रपातैः। क्ष्वेल्यावलोक हसितैर्व्रज सुन्दरीणा- मुत्तम्भयन्न्रतिपतिं रमयाञ्चकार।। -श्रीमद्भा० १०/२९/४६

१४२ • • हित चौरासी देती हैं और व्यङ्ग पूर्ण वचन कहती हैं ३। उन्हें श्रीकृष्ण की मुरली से किसी न किसी प्रकार का प्रेम मय अह अवश्य है तभी तो वे उसके प्रति व्यङ्गसा करती हुई कह देती हैं- गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्मवेणु- र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्। भुङ्क्ते स्वयं यदवाशिष्ट..... -श्रीमद्भा० १०/२१/९ अर्थात् "गोपियो ! इस बाँसुरी ने जाने ऐसा कौनसा पुण्य किया है, जिससे यह गोपियों का भोग्य-दामोदर का अधरामृत स्वयं पीकर दूसरों के लिये केवल बचा खुचा ही छोड़ देती है। अस्तु; यह हुई श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण के रस विलास की शैली और कथा किन्तु इससे अत्यन्त विलक्षण है श्रीहिताचार्य्य चरण का आराध्य तत्व। उनके श्रीकृष्णश्रीराधा पति, अनुकूल नायक, पति, सदा एक नारी व्रती, परम रसिक, प्रेमी, नित्य रास रस परायण, हित सुरत केलि कदम्ब विलासी, निखिल निगमागम अतर्क्य अभेद्य सकल मुनि जन अलक्ष्य और परात्पर भूमा पुरुष होकर ही प्रेम गरीब, अनन्त प्रेमी और सर्व सुलभ हैं। इन्हीं लक्षणों का प्रकाश श्रीहिताचार्य्य चरण के ग्रन्थों में यत्र तत्र सर्वत्र पाया जाता है। तात्पर्य यह रहा कि "आलिङ्गन, चुम्बन परिरंभन उचित जुवति जन पायौ" इस पंक्ति से श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण का लक्षण घटित करना उचित नहीं वरं इस पंक्ति के विकास क्रम से श्रीहित तत्व श्रीकृष्ण को समझने ३-देखिये-गोपियों को अत्यन्त विरहाकुल देखकर श्रीकृष्ण उनके बीच में मुसकाते हुए प्रकट हो गये। तब वे सब गोपियों उनके प्रति प्रणय कोप सा प्रकट करती हुई- ईषत् कुपिता वभाषिरे-बोलीं- भजतोऽनुभजन्त्येक एक एतद्विपर्ययम्। नोभयांश्च भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साधु भोः।। -श्रीमद्भा० १०/३२/१६

हित चौरासी • • १४३ की चेष्टा की जाय तो और भी उत्तम होगा। यह तत्व विवेचन की दृष्टि साम्प्रदायिक दृष्टि नहीं अपितु वस्तु का सूक्ष्म विवेक है-निदर्शन है जिसे चित्त की उच्च भूमिका में ही समझा जा सकता है, जहाँ पर महात्मा व्यास, ध्रुवदास, श्रीहरिदास और विहारिन देव जी आदि महा पुरुषों ने जाकर समझा। कुछ लोग तो इस तत्व विचार से इसलिये भी चौंक उठते हैं कि उनकी स्थूल दृष्टि में श्रीकृष्ण की अनेकता सी सिद्ध होती दिखती है, इन विचारों से; किन्तु बात ऐसी है नहीं। वरं इससे तो श्रीकृष्ण तत्व की महानता के साथ उपासना की महानता का प्रकाश मिलता है। वैसे तो श्रीकृष्ण सदा एक हैं केवल वे उपासना और भावना के ही विचार से राम, वामन, वाराह नृसिंह की भाँति, कन्हैया, पूतनारि, माखन-चोर, गोपाल, चीर-चोर, गोपीनाथ, रासविहारी, मथुरा-वासी, कंसारि, द्वारकावासी और जाने क्या क्या हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीहिताचार्य्य पाद उनके जिस अन्तरङ्ग रूप का प्रकाश करते हैं वह है- निकुञ्ज केलि विलासी और एक मात्र श्रीराधा प्रियतम। और गोपियों के साथ उसका"आलिंगन चुंबन पायौ" आदि विलास श्रीराधा प्रियतमा की इच्छा और कौतुक मात्र है। – ३७ – अवतरण – प्रिया श्रीराधा मानवती हैं; अतः श्रीलालजी से विलग किसी एकान्त कुञ्ज में विराजमान हैं। मानिनि प्रिया के वियोग से व्याकुल प्रियतम उनके बिना अब जीवन धारण करने में ही असमर्थ से हो रहे हैं। उनकी वियोग वलित दशा का वर्णन श्रीहित सखी स्वामिनि श्रीराधा से कर रही हैं-मानों इस वर्णन के बहाने उन्हें प्रियतम के निकट ले चलने के लिये बाध्य कर रही हैं। श्रीहित सखी अपने प्रयास में सफल भी होती हैं और अन्त में मानिनि प्रिया का का मान छुड़ा कर प्रियतम के निकट ला देती हैं। इस पद में ऐसी ही मान जनित विषम विरह व्यथा का वर्णन किया गया है-

१४४ • • हित चौरासी सारंग मूल- चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर। तो बिनु कुँवरि कोटि बनिता जुत, मथत मदन की पीर॥ गदगद सुर विरहाकुल पुलकित, स्रवत विलोचन नीर। क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, विलपत विपिन अधीर॥ बंसी विसिख, व्याल मालावलि, पंचानन पिक कीर। मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखा मृग रिपु चीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश परम कोमल चित, चपल चली पिय तीर। सुनि भयभीत बज्र कौ पंजर, सुरत सूर रन वीर॥३७॥ भावार्थ-(हित सखी ने मानिनि प्रिया से कहा-) "हे मानिनि ! तुम कुञ कुटीर क्यों नहीं चलती हो ? देखो, तो कुमारी राधे ! तुम्हारे बिना श्याम सुन्दर को मदन की बाधा-पीड़ा एक साथ मथे डाल रही है, भले ही वे कोटि कोटि अन्य नारियों (सखियों) से घिरे हैं। (तुम्हारे बिना) उनकी वाणी गद् गद् है, शरीर रोमाञ्चित है, चित्त विरहाकुल है और उनके विलोचनों से (निरन्तर) जल झर रहा है। वे अत्यन्त अधीर होकर समस्त वृन्दावन में "हे वृषभानु नन्दिनी ! कहाँ हो ? कहाँ हो ??" ऐसा विलाप करते फिर रहे हैं। (तुम्हारे विरह में उनके लिये इस समय) वंशी बाण की तरह वक्षस्थल की मालाएँ सर्प की तरह एवं कोयल कीर (की मीठी बोलियाँ) सिंह (गर्जना) की तरह जान पड़ रहे हैं। (अरी ! और तो और) शीतल चन्दन भी विष (जैसा दाहक;) शीतल वायु अग्नि और वस्त्र तो शाखा मृग के रिपु-कमाच फल की तरह दुखः दायी हो रहे हैं।"

हित चौरासी • • १४५ श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि इतना सुनते ही परम कोमल चित्त श्रीराधा चपलता पूर्वक (शीघ्र) प्रियतम के समीप चल पड़ी। उन सुरत शूर वीर का आगमन सुनकर वज्र पञ्जर काम भी भय से भीत हो उठा, काँप गया।* *इस पद में जैसी दशा श्रीराधा विरह में श्रीकृष्ण की वर्णित की गयी है, ऐसी ही दशा का वर्णन श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में श्रीकृष्ण विरहिणी श्रीराधा की किया है। इन दोनों वर्णनों में भावों का सामञ्जस्य है पात्र भेद से स्वयं रति वञ्चिता राधा (मानवती नहीं) अपनी दशा का वर्णन अपनी सखी से कर रही हैं- रिपुमिव सखी संवासोयं शिखीव हिमानिलो, विषमिव सुधा रश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते। हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते वलात्, कुवलय दृशां वामः कामो निकाम निरङ्कुशः॥ अर्थात् श्रीराधा ने कहा-“हे सखि ! यह लता भवन का निवास इस समय तो वैरी जैसा लग रहा है, शीतल वायु भी अग्नि ज्वाला की तरह हो गया है और ये सुधामयी चन्द्र किरणें भी तो विष जैसी मन के लिये दुःख दायी हो रही हैं ! तिस पर फिर यह निर्दय हृदय हीन निरङ्कुश काम अकारण ही हमारा वाम-उलटा हो रहा है तथा हम कमल नयनी वाम दृशाओं का हनन कर रहा है। अरी ! इसका यह कृत्य तो मानो मरे को भी मारने जैसा निन्द्य है !” इतना कहने के पश्चात् वे फिर अपने आप प्रलाप सा करने लगती हैं- बाधां विधेहि मल्यानिल पञ्च वाण प्राणान् गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये। किं ते कृतान्त भगिनि क्षमया तरङ्गै- रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देह दाहः॥ गीत गोविन्द सप्तम सर्ग अर्थात् “हे मल्यानिल ! तुम अपनी बाधाओं को अवश्य ही मेरे लिये उपस्थित करो ? और हे मदन ! तुम भी अपने पाँचों वाणों को एक साथ चलाकर मेरे प्राणों को खींच लो-हरण कर लो, ताकि ये फिर से अपने भवन (इस मेरे देह) का आश्रय न कर सकें। हे कृतान्त भगिनि ! यमुने !! तुम क्यों क्षमा कर रही हो ? तुम भी अपनी शीतल वीचियों का सिञ्चन करो, जिससे शीघ्र मेरा देह दाह हो-शरीर जल सके अस्तु; यह श्रीकृष्ण विरहिणी राधा की दशा है।

१४६ • • हित चौरासी

  • ३८ - अवतरण-पुनः मानिनि राधा के प्रति श्रीहित सजनी का अनुरोध है। जिसमें ये श्रीलालजी की दशा का वर्णन करते हुए उनके (प्रियतम के) निकट चलने के लिये आग्रह कर रही हैं। श्रीप्रियाजी से श्रीहित सखी कहती हैं- सारङ्ग मूल-वेगि चलहि उठि गहरु करति कत, निकुंज बुलावत लाल। हा राधा राधिका पुकारत, निरखि मदन गज ढाल॥ करत सहाइ सरद ससि मारुत, फूटि मिली उर माल। दुर्गम तकत समर अति कातर, करहि न पिय प्रतिपाल॥ (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, श्रवन सुनत तेहि काल। लै राखे गिरि कुच बिच सुंदर, सुरत-सूर ब्रज बाल॥३८॥ भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे राधे ! अब शीघ्र उठ चलो, देर क्यों कर रही हो ? देखो, तुम्हें प्रियतम श्रीलालजी ने बुलाया है। वे काम रूप गजराज को अपनी ओर ढलता आता देखकर "हा राधा ! हा हा राधिके !! इस प्रकार पुकार रहे हैं। (और इस समय) शरत्कालीन चन्द्रमा शीतल पवन, तथा उनके हृदय की सदा सङ्गिनी माला भी आज विद्रोह पूर्वक (शत्रु रूप काम गज से) जा मिली है, अतएव (वे श्रीकृष्ण) युद्ध से अत्यन्त घबराकर अब किसी दुर्गम (कठिनाई से जहाँ कोई शत्रु प्रवेश पा सके) स्थल की ताक-खोज में हैं तब (हे प्यारी !) तुम चल कर अपने प्रियतम का प्रतिपाल-रंक्षण क्यों नहीं करतीं ?" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखी के मुख से) उक्त समाचार अपने कानों में पड़ते ही अत्यन्त आतुर होकर वह सुरत शूर बाला-श्रीराधा उसी

हित चौरासी • • १४७ समय चल पड़ी और उसने अपने गिरि कुचों के बीच (दुर्गम स्थल में) सुन्दर (श्रीलालजी) को ले रखा है-छिपा लिया।

  • ३९ - अवतरण-किन्हीं कारणों से श्रीप्रियाजी को मान हो आया है अतः प्रियतम से विलग होकर मान कुञ्ज में आज अकेली ही आ बैठी हैं। उन्हें मना लाने के लिये श्रीलालजी ने हित सखी को दूती बनाकर भेजा है। हित सखी चतुर दूतिका हैं अतएव श्रीवन की शोभा वर्णन, प्रियतम गुण प्रेम, भाव वर्णन, आदि कलाओं के द्वारा मानिनि को प्रसन्न करना चाहती हैं और अन्त में प्रियतम से मिलाना चाहती हैं। इस पद में इसी लीला का वर्णन है। अब मानिनि नायिका प्रिया श्रीराधा से हित सजनी कह रही हैं- सारङ्ग मूल-खेल्यौ लाल चाहत रवन। रचि रचि अपने हाथ सँवारयौ निकुंज भवन।। रजनी सरद मंद सौरभ सौं सीतल पवन। तो बिनु कुँवरि काम की बेदन मेटब कवन।। चलहि न चपल बाल मृगनैनी तजिऽब मवन। (जै श्री) हित हरिवंश मिलऽब प्यारे की आरति दवन।।३९।। भावार्थ- (श्रीहित अलि ने कहा-) 'हे राधे ! लाल (तुम्हारे प्रियतम) विहार (खेल) खेलना चाहते हैं; इसलिये उन्होंने अपने हाथों निकुञ्ज भवन रचकर तैयार किया है-सम्हाला है। हे किशोरी (देखो) शरद की रात्रि है और मन्द गामी सुगन्ध युक्त शीतल पवन है फिर भला तुम्हारे बिना ऐसा कौन है जो काम की वेदना (प्रियतम के हृदय से) मिटा सके ? तब हे बाल मृगनयनि ! [तुम अपने] मौन का परित्याग करके शीघ्र ही अब क्यों नहीं चल रही हो? चलो न! अरी! प्रियतम के दुःखों का दमन करने वाली राधे ! (शीघ्र चल कर) अब उनसे मिलो।"

१४८ • • हित चौरासी – ४० – अवतरण-पूर्व पद में दूतिका का प्रयास व्यर्थ रहा वह अपनी वचन चातुरी से नायिका को प्रसन्न नहीं कर सकी और न प्रियाजी ने उसकी कोई बात ही मानी, अतएव उसने फिर भी उक्त क्रम से अनुनय प्रारम्भ की। उसने कहा- सारङ्ग मूल-बैठे लाल निकुंज भवन। रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पवन।। तूँ सखी काम केलि मन मोहन मदन दवन। वृथा गहरु कत करति कृसोदरि कारन कवन।। चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन। (जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन।।४०।। भावार्थ- (हित सखी ने फिर कहा-) "हे मानिनि ! लाल (तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए) निकुञ्ज भवन में बैठे हैं। (इस समय) कैसी सुन्दर रुचि दायक रात्रि है, मल्लिकाएँ खिल रही हैं और शीतल, सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है। (ऐसे अवसर में) हे सखी ! केवल एक तू ही है जो अपनी काम केलि के द्वारा मन मोहन के मदन (ताप) का दमन (शमन) कर सकती है, तब हे कृशोदरि ! व्यर्थ विलम्ब क्यों कर रही हो? कारण क्या है? श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि अपने कानों यह सुनते ही श्रीप्रियाजी को तन सुधि का भी विस्मरण हो गया (-वे श्रीलालजी के विरह दुःख से अत्यन्त विह्वल होकर) शीघ्रता पूर्वक चल पड़ीं तब रस लम्पट रमण श्रीलालजी श्रीराधिका से मिले। – ४१ – अवतरण-इस इकतालीसवें पद में प्रियतम की अपने प्रेमास्पद के प्रति एकान्त निष्ठा और द्रवित प्रेम पूर्ण हृदय की सराहना के साथ ऐसा हृदय बनाने के साधक जनों के लिये सङ्केत है। श्रीश्याम सुन्दर ही यथार्थतः प्रीति तत्व के

हित चौरासी • • १४६ ज्ञाता एवं पालक हैं। वे प्रीति रीति वश अखिल ब्रह्माण्ड नायक होकर भी महा दीन हैं— 'दीनता' ही उनका अपनापन है-अस्तित्व है। वे भोगी नहीं अपितु एकान्त वल्लभ प्रेमी हैं तभी तो कोटि कोटि कामिनियों से आवृत रहकर भी अपनी आराध्या प्राण धन श्रीराधा की ही याचना करते और उनके विना अन्य सबको नहीं जैसा अनुभव करते हैं। श्रीलालजी की उक्त हृदय स्थिति की ओर लक्ष्य कराते हुए श्रीहिताचार्य चरण उपदेश करते हैं कि सत्व प्रज्ञ बुध जनो ! उस प्रेम तत्व की विलक्षणता का दर्शन अनुभव तो करो जिसने श्रीलालजी जैसे सच्चिदानन्द घन परिपूर्णतम परात्पर ब्रह्म को भी दीन बना रखा है, परवश कर दिया है; जो पूर्ण सर्व तन्त्र स्वतन्त्र था। कैसी अनोखी है वह प्रेम की मर्यादा-मैंड? इस 'प्रेम-मैंड' का पहचानना ही साधक-प्रेमी उपासक की चतुरता है या नित्यानित्य वस्तु का चरम विवेक है। अस्तु; अब उस प्रेम मैंड का निरूपण श्रीहिताचार्य पाद करते हैं- सारङ्ग मूल-प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै। जद्यपि सकल लोक चूड़ामनि दीन अपनपौ मानै।। जमुना पुलिन निकुंज भवन में मान मानिनी ठानै। निकट नवीन कोटि कामिनि कुल धीरज मनहिं न आनै।। नस्वर नेह चपल मधुकर ज्यौं आँन आँन सौं बानै। (जै श्री) हित हरिवंश चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानै।।४१।। भावार्थ-प्रीति की रीति तो केवल रँगीले (प्रेमी) श्रीलालजी ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं; तभी तो वे समस्त लोकों के अधिनायक-सिर मौर होकर भी अपने आप को (प्रेम परवश) दीन (लघु) मानते हैं। जब यमुना पुलिन पर निकुञ्ज भवन में श्रीराधिका मान ठान कर मानिनि हो जाती है (या रूठ कर अन्यत्र चली जाती है तब ये अपने निकट कोटि कोटि कामिनियों के होते रहने पर भी अपने मन में धैर्य नहीं लाते, (-व्याकुल हो हो जाते हैं अपनी प्रियतमा के बिना।)

१५० • • हित चौरासी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं( किंतु उपरोक्त एक निष्ठा के विपरीत) जो प्रेम चपल भ्रमर की भाँति (क्षण क्षण में) अन्य अन्य किन्हीं से बनता (और बिगड़ता भी) रहता है वह तो विनाशी है, नश्वर है। (किमधिकं प्रेम ही नहीं है।) (अब) जो (उपासक प्रेमी) श्रीलालजी को भी छोड़ (अलग रख) कर इस (प्रेम मर्यादा) मैंड को पहचानता है वही चतुर है—सच्चा विवेकी है। टिप्पणी—लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानैं— श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के द्वारा प्रकाशित उपासना मार्ग का लक्ष्य केवल परात्पर प्रेम तत्व है। प्रेम के सिवाय न प्रिया है न प्रियतम श्रीकृष्ण ही। वरं ये दोनों प्रेमी प्रेमास्पद श्रीराधावल्लभ लाल भी इस उपासना में प्रेम के दो रूपान्तरों में ही स्वीकार किये गये हैं। जैसा कि महात्मा श्रीलाड़िली दास जी ने कहा है— गौर स्याम सीसीनु में भरयौ रंग अनुराग। और— नव किसोर सुकुमार तन मृदु भुज मेले अंस। जोरी सनी सनेह रस प्रकट करी हरिवंश।। -हित ध्रुवदास जी अर्थात् श्रीहरिवंश ने तो स्नेह रस सनी हुई 'जोरी' श्रीराधावल्लभ लाल को प्रकट किया, अतएव इस प्रेम तत्व के यही प्रकाशक हुए। श्रीहित ध्रुवदास जी इस बात की साक्षी भर रहे हैं— प्रकट प्रेम कौ रूप धरि, श्रीहरिवंश उदार। राधावल्लभ लाल कौ, प्रकट कियौ रस सार।। उक्त कथन पर से यह समझने की बात है कि इस श्रीहरिवंशोदित प्रेमोपासना में सामान्य उपासना की त्रिपुटी (उपास्य, उपासक और उपासना) का लोप होकर अन्ततः केवल एक ही वस्तु की सिद्धि होती है और वह सिद्ध तत्व है प्रेम।

हित चौरासी • • १५१ हाँ, पाठक गण उपास्य और उपासना को प्रेम तत्व स्वीकार कर लेंगे पर उन्हें उपासक के प्रेम रूप स्वीकार करने में हिचक होगी किन्तु इस तत्व का प्रकाश महापुरुषों ने किस प्रकार किया है उसे भी देखिये, वे कहते हैं- घट घट में परगट दुरयौ, विनु अकार आकार। पूरि रहयौ हित जगत में, सहज रूप सिंगार॥ हित माते आनँद भरे नैन सवनि सौं चारि। सकल जगत सौं एकता कहा पुरुष कहा नारि॥

  • श्रीमोहनमत्त जी अर्थात् 'वह प्रेम प्रगट रूप से प्रत्येक के हृदय में विना आकार प्रकार के छिपा बैठा है; इस तरह वह स्वाभाविक परम सुन्दर शृङ्गार मय बनकर समस्त विश्व में छा गया है। ये प्रेम भरे नेत्र जब किसी से मिलकर चार होते हैं, तब सबसे एकता ही करते हैं फिर चाहे वह नारी हो या पुरुष प्रेम तो अपने सूत्र से बाँध ही लेता है।' अज्ञानवश अपना शुद्ध स्वरूप भूलकर 'जीव' जीव बन बैठा है। वैसे तो वह तद्रूप ब्रह्म है-प्रेम है। जीव के स्वरूप का प्रकाश करते हुए महात्मा श्रीलाड़िलीदास जी कहते हैं- भोगी भोगासक्ति सौं, भूलि आपनौ रूप। तन तन प्रति मानी भये मैं तू' जगत् स्वरूप॥ सर्व देहमय विपिन है, सर्व मनोमय लाल। सर्व सु इन्द्री सखीगन, सर्व आत्मा बाल॥ मन भूल्यौ निजु आतमा, इन्द्रिनु मिलि सुख लीन। तन अभिमानी जग भयौ, काल कर्म आधीन॥ भोग रूप सब प्रिया कौ, भोगी मोहन लाल। संधि सखी हित दुँहुनि की, मिलवत हैं सब काल॥ चिदानंद हित सूर्य लौं सकल जगत रहयौ छाइ। अहं बदरिया ओट में दुरयौ लह्यौ नहिं जाइ॥ -सुधर्म बोधिनी

१५२ • • हित चौरासी भाव यह कि 'भोगासक्ति से ही जीव अपना शुद्ध हित रूप भूलकर भोगी बन गया और देहाभिमानी बन गया। यही 'मैं तू' रूप जगत् है। वैसे तो समष्टि देह श्रीवृन्दावन है, समस्त मन श्रीकृष्ण हैं, ऐसे ही समस्त प्राणियों की इन्द्रियाँ सखीगण हैं और समस्त अनन्त व्यापक आत्मा ही प्रिया श्रीराधा है। मन अपने आत्म स्वरूप को भूलकर इन्द्रिय सुखों में तल्लीन होकर देहाभिमानी बन गया फलतः काल और कर्मों के अधीन होना पड़ा उसे। यों तो समस्त भोगों का एक ध्यष्टि रूप श्रीप्रियाजी-राधिका हैं और भोगी हैं मोहन लाल श्रीकृष्ण। समस्त भोगों का संयोग ही सखियाँ हैं-संधि है। इस प्रकार यह चिदानन्दमय हित-प्रेम सूर्य की तरह सर्वत्र प्रकाशित है किन्तु अहङ्कार के बादलों में ढँक जाने से स्पष्ट दीख नहीं रहा है। अतः स्पष्ट है कि- जो रस रीति सबनि तें दूरि। सो सब विश्व रही भरपूरि॥ -श्री सेवकजी सारांश यह कि उपासक भी तत्स्वरूप है किंतु भ्रमवश अपने स्वरूप में अहं का आरोप करके अपने शुद्ध स्वरूप-हित (प्रेम) से वञ्चित है। इसी अपने स्वरूप हित-प्रेम को पहचानने के लिये श्रीहिताचार्य्य चरण का सङ्केत है-आदेश है- चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानै। क्योंकि वह 'मैंड' (मर्यादा) सिवाय प्रेम के और कुछ नहीं है।

  • ४२ - अवतरण-उक्त पद में जिस प्रेम मैंड के पहचानने का आदेश है इस पद में उसी प्रेम के स्वरूप का किञ्चित् विचार किया गया है- सारङ्ग मूल-प्रीति न काहु की कानि बिचारै। मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै॥

हित चौरासी • • १५३ ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै। ज्यौं नादहि मन दियैं कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।। (जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै। नाइक निपुन नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै॥४२॥ भावार्थ-प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती। अरे ! प्रेम से विशेष विवश मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ? श्रावण मास के जल से उमङ्गे भरती हुई नदी जैसे सीधे समुद्र की ही ओर दौड़ती है और जिस प्रकार (बहेलिये के द्वारा गाये हुए मधुर) नाद में ही मन दिये हुए कुरङ्ग (हरिन) को बहेलिया प्रत्यक्ष रूप से मार डालता है, परन्तु फिर भी इनको बहने और मरने से कोई निवृत्त नहीं कर सकता। उसी प्रकार शलभ दीपक की अटक (आसक्ति) में अपने देह को भी जला डालता है, (वह भी किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता।) श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद) कहते हैं कि नवल मोहन जैसे निपुण नायक (प्रेमी) के सिवाय और कौन ऐसा है जो (प्रेम में) अपना अपनापन-स्वाभिमान भी खो दे या हार जाय। टिप्पणी—“मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै?” प्रेमी के हृदय में जब किसी के प्रति दृढ़ आसक्ति का उदय हो जाता है तब उसके पास उचित किंवा अनुचित का प्रायः विचार विवेक नहीं रह जाता। वह अपने प्रेमास्पद के लिये प्रेम परवश जो कुछ करता है अपनी समझ में सर्वथा उचित ही करता है अतः उसे उस पथ पर से विचलित या निवारित करना कठिन होता है। ऐसा प्रेमी अपने प्रेमास्पद से प्रेम करके जगत् दृष्टि शास्त्र दृष्टि एवं शिष्ट दृष्टि से अनुचित समझे जाने वाले कार्यों को करके भी अनुचित समझता ही नहीं। अथवा यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उसके पास इस उचित अनुचित के विचारा विचार के लिये न समय है न बुद्धि और आवश्यकता ही। वह तो अपने प्रेमास्पद से इतना तल्लीन हो जाता है कि दूसरों के द्वारा कहा गया शास्त्रोक्त किंवा सामाजिक कथन उसके लिये व्यर्थ प्रलाप से अधिक कुछ नहीं है।