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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१५२ • • हित चौरासी भाव यह कि 'भोगासक्ति से ही जीव अपना शुद्ध हित रूप भूलकर भोगी बन गया और देहाभिमानी बन गया। यही 'मैं तू' रूप जगत् है। वैसे तो समष्टि देह श्रीवृन्दावन है, समस्त मन श्रीकृष्ण हैं, ऐसे ही समस्त प्राणियों की इन्द्रियाँ सखीगण हैं और समस्त अनन्त व्यापक आत्मा ही प्रिया श्रीराधा है। मन अपने आत्म स्वरूप को भूलकर इन्द्रिय सुखों में तल्लीन होकर देहाभिमानी बन गया फलतः काल और कर्मों के अधीन होना पड़ा उसे। यों तो समस्त भोगों का एक ध्यष्टि रूप श्रीप्रियाजी-राधिका हैं और भोगी हैं मोहन लाल श्रीकृष्ण। समस्त भोगों का संयोग ही सखियाँ हैं-संधि है। इस प्रकार यह चिदानन्दमय हित-प्रेम सूर्य की तरह सर्वत्र प्रकाशित है किन्तु अहङ्कार के बादलों में ढँक जाने से स्पष्ट दीख नहीं रहा है। अतः स्पष्ट है कि- जो रस रीति सबनि तें दूरि। सो सब विश्व रही भरपूरि॥ -श्री सेवकजी सारांश यह कि उपासक भी तत्स्वरूप है किंतु भ्रमवश अपने स्वरूप में अहं का आरोप करके अपने शुद्ध स्वरूप-हित (प्रेम) से वञ्चित है। इसी अपने स्वरूप हित-प्रेम को पहचानने के लिये श्रीहिताचार्य्य चरण का सङ्केत है-आदेश है- चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानै। क्योंकि वह 'मैंड' (मर्यादा) सिवाय प्रेम के और कुछ नहीं है।

  • ४२ - अवतरण-उक्त पद में जिस प्रेम मैंड के पहचानने का आदेश है इस पद में उसी प्रेम के स्वरूप का किञ्चित् विचार किया गया है- सारङ्ग मूल-प्रीति न काहु की कानि बिचारै। मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै॥