हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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हित चौरासी • • १५१ हाँ, पाठक गण उपास्य और उपासना को प्रेम तत्व स्वीकार कर लेंगे पर उन्हें उपासक के प्रेम रूप स्वीकार करने में हिचक होगी किन्तु इस तत्व का प्रकाश महापुरुषों ने किस प्रकार किया है उसे भी देखिये, वे कहते हैं- घट घट में परगट दुरयौ, विनु अकार आकार। पूरि रहयौ हित जगत में, सहज रूप सिंगार॥ हित माते आनँद भरे नैन सवनि सौं चारि। सकल जगत सौं एकता कहा पुरुष कहा नारि॥
- श्रीमोहनमत्त जी अर्थात् 'वह प्रेम प्रगट रूप से प्रत्येक के हृदय में विना आकार प्रकार के छिपा बैठा है; इस तरह वह स्वाभाविक परम सुन्दर शृङ्गार मय बनकर समस्त विश्व में छा गया है। ये प्रेम भरे नेत्र जब किसी से मिलकर चार होते हैं, तब सबसे एकता ही करते हैं फिर चाहे वह नारी हो या पुरुष प्रेम तो अपने सूत्र से बाँध ही लेता है।' अज्ञानवश अपना शुद्ध स्वरूप भूलकर 'जीव' जीव बन बैठा है। वैसे तो वह तद्रूप ब्रह्म है-प्रेम है। जीव के स्वरूप का प्रकाश करते हुए महात्मा श्रीलाड़िलीदास जी कहते हैं- भोगी भोगासक्ति सौं, भूलि आपनौ रूप। तन तन प्रति मानी भये मैं तू' जगत् स्वरूप॥ सर्व देहमय विपिन है, सर्व मनोमय लाल। सर्व सु इन्द्री सखीगन, सर्व आत्मा बाल॥ मन भूल्यौ निजु आतमा, इन्द्रिनु मिलि सुख लीन। तन अभिमानी जग भयौ, काल कर्म आधीन॥ भोग रूप सब प्रिया कौ, भोगी मोहन लाल। संधि सखी हित दुँहुनि की, मिलवत हैं सब काल॥ चिदानंद हित सूर्य लौं सकल जगत रहयौ छाइ। अहं बदरिया ओट में दुरयौ लह्यौ नहिं जाइ॥ -सुधर्म बोधिनी