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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

हित चौरासी • • १५३ ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै। ज्यौं नादहि मन दियैं कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।। (जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै। नाइक निपुन नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै॥४२॥ भावार्थ-प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती। अरे ! प्रेम से विशेष विवश मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ? श्रावण मास के जल से उमङ्गे भरती हुई नदी जैसे सीधे समुद्र की ही ओर दौड़ती है और जिस प्रकार (बहेलिये के द्वारा गाये हुए मधुर) नाद में ही मन दिये हुए कुरङ्ग (हरिन) को बहेलिया प्रत्यक्ष रूप से मार डालता है, परन्तु फिर भी इनको बहने और मरने से कोई निवृत्त नहीं कर सकता। उसी प्रकार शलभ दीपक की अटक (आसक्ति) में अपने देह को भी जला डालता है, (वह भी किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता।) श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद) कहते हैं कि नवल मोहन जैसे निपुण नायक (प्रेमी) के सिवाय और कौन ऐसा है जो (प्रेम में) अपना अपनापन-स्वाभिमान भी खो दे या हार जाय। टिप्पणी—“मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै?” प्रेमी के हृदय में जब किसी के प्रति दृढ़ आसक्ति का उदय हो जाता है तब उसके पास उचित किंवा अनुचित का प्रायः विचार विवेक नहीं रह जाता। वह अपने प्रेमास्पद के लिये प्रेम परवश जो कुछ करता है अपनी समझ में सर्वथा उचित ही करता है अतः उसे उस पथ पर से विचलित या निवारित करना कठिन होता है। ऐसा प्रेमी अपने प्रेमास्पद से प्रेम करके जगत् दृष्टि शास्त्र दृष्टि एवं शिष्ट दृष्टि से अनुचित समझे जाने वाले कार्यों को करके भी अनुचित समझता ही नहीं। अथवा यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उसके पास इस उचित अनुचित के विचारा विचार के लिये न समय है न बुद्धि और आवश्यकता ही। वह तो अपने प्रेमास्पद से इतना तल्लीन हो जाता है कि दूसरों के द्वारा कहा गया शास्त्रोक्त किंवा सामाजिक कथन उसके लिये व्यर्थ प्रलाप से अधिक कुछ नहीं है।