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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

हित चौरासी • • १४३ की चेष्टा की जाय तो और भी उत्तम होगा। यह तत्व विवेचन की दृष्टि साम्प्रदायिक दृष्टि नहीं अपितु वस्तु का सूक्ष्म विवेक है-निदर्शन है जिसे चित्त की उच्च भूमिका में ही समझा जा सकता है, जहाँ पर महात्मा व्यास, ध्रुवदास, श्रीहरिदास और विहारिन देव जी आदि महा पुरुषों ने जाकर समझा। कुछ लोग तो इस तत्व विचार से इसलिये भी चौंक उठते हैं कि उनकी स्थूल दृष्टि में श्रीकृष्ण की अनेकता सी सिद्ध होती दिखती है, इन विचारों से; किन्तु बात ऐसी है नहीं। वरं इससे तो श्रीकृष्ण तत्व की महानता के साथ उपासना की महानता का प्रकाश मिलता है। वैसे तो श्रीकृष्ण सदा एक हैं केवल वे उपासना और भावना के ही विचार से राम, वामन, वाराह नृसिंह की भाँति, कन्हैया, पूतनारि, माखन-चोर, गोपाल, चीर-चोर, गोपीनाथ, रासविहारी, मथुरा-वासी, कंसारि, द्वारकावासी और जाने क्या क्या हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीहिताचार्य्य पाद उनके जिस अन्तरङ्ग रूप का प्रकाश करते हैं वह है- निकुञ्ज केलि विलासी और एक मात्र श्रीराधा प्रियतम। और गोपियों के साथ उसका"आलिंगन चुंबन पायौ" आदि विलास श्रीराधा प्रियतमा की इच्छा और कौतुक मात्र है। – ३७ – अवतरण – प्रिया श्रीराधा मानवती हैं; अतः श्रीलालजी से विलग किसी एकान्त कुञ्ज में विराजमान हैं। मानिनि प्रिया के वियोग से व्याकुल प्रियतम उनके बिना अब जीवन धारण करने में ही असमर्थ से हो रहे हैं। उनकी वियोग वलित दशा का वर्णन श्रीहित सखी स्वामिनि श्रीराधा से कर रही हैं-मानों इस वर्णन के बहाने उन्हें प्रियतम के निकट ले चलने के लिये बाध्य कर रही हैं। श्रीहित सखी अपने प्रयास में सफल भी होती हैं और अन्त में मानिनि प्रिया का का मान छुड़ा कर प्रियतम के निकट ला देती हैं। इस पद में ऐसी ही मान जनित विषम विरह व्यथा का वर्णन किया गया है-