हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ • • हित चौरासी सारंग मूल- चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर। तो बिनु कुँवरि कोटि बनिता जुत, मथत मदन की पीर॥ गदगद सुर विरहाकुल पुलकित, स्रवत विलोचन नीर। क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, विलपत विपिन अधीर॥ बंसी विसिख, व्याल मालावलि, पंचानन पिक कीर। मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखा मृग रिपु चीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश परम कोमल चित, चपल चली पिय तीर। सुनि भयभीत बज्र कौ पंजर, सुरत सूर रन वीर॥३७॥ भावार्थ-(हित सखी ने मानिनि प्रिया से कहा-) "हे मानिनि ! तुम कुञ कुटीर क्यों नहीं चलती हो ? देखो, तो कुमारी राधे ! तुम्हारे बिना श्याम सुन्दर को मदन की बाधा-पीड़ा एक साथ मथे डाल रही है, भले ही वे कोटि कोटि अन्य नारियों (सखियों) से घिरे हैं। (तुम्हारे बिना) उनकी वाणी गद् गद् है, शरीर रोमाञ्चित है, चित्त विरहाकुल है और उनके विलोचनों से (निरन्तर) जल झर रहा है। वे अत्यन्त अधीर होकर समस्त वृन्दावन में "हे वृषभानु नन्दिनी ! कहाँ हो ? कहाँ हो ??" ऐसा विलाप करते फिर रहे हैं। (तुम्हारे विरह में उनके लिये इस समय) वंशी बाण की तरह वक्षस्थल की मालाएँ सर्प की तरह एवं कोयल कीर (की मीठी बोलियाँ) सिंह (गर्जना) की तरह जान पड़ रहे हैं। (अरी ! और तो और) शीतल चन्दन भी विष (जैसा दाहक;) शीतल वायु अग्नि और वस्त्र तो शाखा मृग के रिपु-कमाच फल की तरह दुखः दायी हो रहे हैं।"