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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 151

हित चौरासी • • १४५ श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि इतना सुनते ही परम कोमल चित्त श्रीराधा चपलता पूर्वक (शीघ्र) प्रियतम के समीप चल पड़ी। उन सुरत शूर वीर का आगमन सुनकर वज्र पञ्जर काम भी भय से भीत हो उठा, काँप गया।* *इस पद में जैसी दशा श्रीराधा विरह में श्रीकृष्ण की वर्णित की गयी है, ऐसी ही दशा का वर्णन श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में श्रीकृष्ण विरहिणी श्रीराधा की किया है। इन दोनों वर्णनों में भावों का सामञ्जस्य है पात्र भेद से स्वयं रति वञ्चिता राधा (मानवती नहीं) अपनी दशा का वर्णन अपनी सखी से कर रही हैं- रिपुमिव सखी संवासोयं शिखीव हिमानिलो, विषमिव सुधा रश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते। हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते वलात्, कुवलय दृशां वामः कामो निकाम निरङ्कुशः॥ अर्थात् श्रीराधा ने कहा-“हे सखि ! यह लता भवन का निवास इस समय तो वैरी जैसा लग रहा है, शीतल वायु भी अग्नि ज्वाला की तरह हो गया है और ये सुधामयी चन्द्र किरणें भी तो विष जैसी मन के लिये दुःख दायी हो रही हैं ! तिस पर फिर यह निर्दय हृदय हीन निरङ्कुश काम अकारण ही हमारा वाम-उलटा हो रहा है तथा हम कमल नयनी वाम दृशाओं का हनन कर रहा है। अरी ! इसका यह कृत्य तो मानो मरे को भी मारने जैसा निन्द्य है !” इतना कहने के पश्चात् वे फिर अपने आप प्रलाप सा करने लगती हैं- बाधां विधेहि मल्यानिल पञ्च वाण प्राणान् गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये। किं ते कृतान्त भगिनि क्षमया तरङ्गै- रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देह दाहः॥ गीत गोविन्द सप्तम सर्ग अर्थात् “हे मल्यानिल ! तुम अपनी बाधाओं को अवश्य ही मेरे लिये उपस्थित करो ? और हे मदन ! तुम भी अपने पाँचों वाणों को एक साथ चलाकर मेरे प्राणों को खींच लो-हरण कर लो, ताकि ये फिर से अपने भवन (इस मेरे देह) का आश्रय न कर सकें। हे कृतान्त भगिनि ! यमुने !! तुम क्यों क्षमा कर रही हो ? तुम भी अपनी शीतल वीचियों का सिञ्चन करो, जिससे शीघ्र मेरा देह दाह हो-शरीर जल सके अस्तु; यह श्रीकृष्ण विरहिणी राधा की दशा है।