भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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१४६ • • हित चौरासी

  • ३८ - अवतरण-पुनः मानिनि राधा के प्रति श्रीहित सजनी का अनुरोध है। जिसमें ये श्रीलालजी की दशा का वर्णन करते हुए उनके (प्रियतम के) निकट चलने के लिये आग्रह कर रही हैं। श्रीप्रियाजी से श्रीहित सखी कहती हैं- सारङ्ग मूल-वेगि चलहि उठि गहरु करति कत, निकुंज बुलावत लाल। हा राधा राधिका पुकारत, निरखि मदन गज ढाल॥ करत सहाइ सरद ससि मारुत, फूटि मिली उर माल। दुर्गम तकत समर अति कातर, करहि न पिय प्रतिपाल॥ (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, श्रवन सुनत तेहि काल। लै राखे गिरि कुच बिच सुंदर, सुरत-सूर ब्रज बाल॥३८॥ भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे राधे ! अब शीघ्र उठ चलो, देर क्यों कर रही हो ? देखो, तुम्हें प्रियतम श्रीलालजी ने बुलाया है। वे काम रूप गजराज को अपनी ओर ढलता आता देखकर "हा राधा ! हा हा राधिके !! इस प्रकार पुकार रहे हैं। (और इस समय) शरत्कालीन चन्द्रमा शीतल पवन, तथा उनके हृदय की सदा सङ्गिनी माला भी आज विद्रोह पूर्वक (शत्रु रूप काम गज से) जा मिली है, अतएव (वे श्रीकृष्ण) युद्ध से अत्यन्त घबराकर अब किसी दुर्गम (कठिनाई से जहाँ कोई शत्रु प्रवेश पा सके) स्थल की ताक-खोज में हैं तब (हे प्यारी !) तुम चल कर अपने प्रियतम का प्रतिपाल-रंक्षण क्यों नहीं करतीं ?" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (सखी के मुख से) उक्त समाचार अपने कानों में पड़ते ही अत्यन्त आतुर होकर वह सुरत शूर बाला-श्रीराधा उसी