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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

हित चौरासी • • १४७ समय चल पड़ी और उसने अपने गिरि कुचों के बीच (दुर्गम स्थल में) सुन्दर (श्रीलालजी) को ले रखा है-छिपा लिया।

  • ३९ - अवतरण-किन्हीं कारणों से श्रीप्रियाजी को मान हो आया है अतः प्रियतम से विलग होकर मान कुञ्ज में आज अकेली ही आ बैठी हैं। उन्हें मना लाने के लिये श्रीलालजी ने हित सखी को दूती बनाकर भेजा है। हित सखी चतुर दूतिका हैं अतएव श्रीवन की शोभा वर्णन, प्रियतम गुण प्रेम, भाव वर्णन, आदि कलाओं के द्वारा मानिनि को प्रसन्न करना चाहती हैं और अन्त में प्रियतम से मिलाना चाहती हैं। इस पद में इसी लीला का वर्णन है। अब मानिनि नायिका प्रिया श्रीराधा से हित सजनी कह रही हैं- सारङ्ग मूल-खेल्यौ लाल चाहत रवन। रचि रचि अपने हाथ सँवारयौ निकुंज भवन।। रजनी सरद मंद सौरभ सौं सीतल पवन। तो बिनु कुँवरि काम की बेदन मेटब कवन।। चलहि न चपल बाल मृगनैनी तजिऽब मवन। (जै श्री) हित हरिवंश मिलऽब प्यारे की आरति दवन।।३९।। भावार्थ- (श्रीहित अलि ने कहा-) 'हे राधे ! लाल (तुम्हारे प्रियतम) विहार (खेल) खेलना चाहते हैं; इसलिये उन्होंने अपने हाथों निकुञ्ज भवन रचकर तैयार किया है-सम्हाला है। हे किशोरी (देखो) शरद की रात्रि है और मन्द गामी सुगन्ध युक्त शीतल पवन है फिर भला तुम्हारे बिना ऐसा कौन है जो काम की वेदना (प्रियतम के हृदय से) मिटा सके ? तब हे बाल मृगनयनि ! [तुम अपने] मौन का परित्याग करके शीघ्र ही अब क्यों नहीं चल रही हो? चलो न! अरी! प्रियतम के दुःखों का दमन करने वाली राधे ! (शीघ्र चल कर) अब उनसे मिलो।"