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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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१४८ • • हित चौरासी – ४० – अवतरण-पूर्व पद में दूतिका का प्रयास व्यर्थ रहा वह अपनी वचन चातुरी से नायिका को प्रसन्न नहीं कर सकी और न प्रियाजी ने उसकी कोई बात ही मानी, अतएव उसने फिर भी उक्त क्रम से अनुनय प्रारम्भ की। उसने कहा- सारङ्ग मूल-बैठे लाल निकुंज भवन। रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पवन।। तूँ सखी काम केलि मन मोहन मदन दवन। वृथा गहरु कत करति कृसोदरि कारन कवन।। चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन। (जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन।।४०।। भावार्थ- (हित सखी ने फिर कहा-) "हे मानिनि ! लाल (तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए) निकुञ्ज भवन में बैठे हैं। (इस समय) कैसी सुन्दर रुचि दायक रात्रि है, मल्लिकाएँ खिल रही हैं और शीतल, सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है। (ऐसे अवसर में) हे सखी ! केवल एक तू ही है जो अपनी काम केलि के द्वारा मन मोहन के मदन (ताप) का दमन (शमन) कर सकती है, तब हे कृशोदरि ! व्यर्थ विलम्ब क्यों कर रही हो? कारण क्या है? श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि अपने कानों यह सुनते ही श्रीप्रियाजी को तन सुधि का भी विस्मरण हो गया (-वे श्रीलालजी के विरह दुःख से अत्यन्त विह्वल होकर) शीघ्रता पूर्वक चल पड़ीं तब रस लम्पट रमण श्रीलालजी श्रीराधिका से मिले। – ४१ – अवतरण-इस इकतालीसवें पद में प्रियतम की अपने प्रेमास्पद के प्रति एकान्त निष्ठा और द्रवित प्रेम पूर्ण हृदय की सराहना के साथ ऐसा हृदय बनाने के साधक जनों के लिये सङ्केत है। श्रीश्याम सुन्दर ही यथार्थतः प्रीति तत्व के