हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १४६ ज्ञाता एवं पालक हैं। वे प्रीति रीति वश अखिल ब्रह्माण्ड नायक होकर भी महा दीन हैं— 'दीनता' ही उनका अपनापन है-अस्तित्व है। वे भोगी नहीं अपितु एकान्त वल्लभ प्रेमी हैं तभी तो कोटि कोटि कामिनियों से आवृत रहकर भी अपनी आराध्या प्राण धन श्रीराधा की ही याचना करते और उनके विना अन्य सबको नहीं जैसा अनुभव करते हैं। श्रीलालजी की उक्त हृदय स्थिति की ओर लक्ष्य कराते हुए श्रीहिताचार्य चरण उपदेश करते हैं कि सत्व प्रज्ञ बुध जनो ! उस प्रेम तत्व की विलक्षणता का दर्शन अनुभव तो करो जिसने श्रीलालजी जैसे सच्चिदानन्द घन परिपूर्णतम परात्पर ब्रह्म को भी दीन बना रखा है, परवश कर दिया है; जो पूर्ण सर्व तन्त्र स्वतन्त्र था। कैसी अनोखी है वह प्रेम की मर्यादा-मैंड? इस 'प्रेम-मैंड' का पहचानना ही साधक-प्रेमी उपासक की चतुरता है या नित्यानित्य वस्तु का चरम विवेक है। अस्तु; अब उस प्रेम मैंड का निरूपण श्रीहिताचार्य पाद करते हैं- सारङ्ग मूल-प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै। जद्यपि सकल लोक चूड़ामनि दीन अपनपौ मानै।। जमुना पुलिन निकुंज भवन में मान मानिनी ठानै। निकट नवीन कोटि कामिनि कुल धीरज मनहिं न आनै।। नस्वर नेह चपल मधुकर ज्यौं आँन आँन सौं बानै। (जै श्री) हित हरिवंश चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड पहिचानै।।४१।। भावार्थ-प्रीति की रीति तो केवल रँगीले (प्रेमी) श्रीलालजी ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं; तभी तो वे समस्त लोकों के अधिनायक-सिर मौर होकर भी अपने आप को (प्रेम परवश) दीन (लघु) मानते हैं। जब यमुना पुलिन पर निकुञ्ज भवन में श्रीराधिका मान ठान कर मानिनि हो जाती है (या रूठ कर अन्यत्र चली जाती है तब ये अपने निकट कोटि कोटि कामिनियों के होते रहने पर भी अपने मन में धैर्य नहीं लाते, (-व्याकुल हो हो जाते हैं अपनी प्रियतमा के बिना।)