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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

हित चौरासी • • १४१ अभेद रूपा हैं। इसीलिये इस महादान के अवसर में श्रीहिताचार्य चरण ने सावधानी पूर्वक विशेषण दिया श्रीलालजी के लिये- 'सकल उदार नृपति चूड़ामनि' अस्तु; सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण, उनके रास रस एवं श्रृंगार रस की लीलाओं एवं श्रीहिताचार्य द्वारा प्रकाशित श्रीकृष्ण रस सार में बहुत बड़ा अन्तर देखा पाया जाता है। देखिये; श्रीमद्भागवत वर्णित श्रीकृष्ण गोपियों के जार-उपपति तथा अनेक नारी नायक (बहुनायक) हैं उनका उन गोपियों के साथ रस काव्य की पद्धति के अनुसार रमण भी होता है, जो उनके अनङ्ग वर्द्धन वेणु गान को सुन कर रास में आयी हैं१। उन आयी हुई गोपियों के साथ श्रीकृष्ण हँसी ठिठोली, भ्रू विक्षेप, अलक स्पर्श, नखाग्र घात, हास परिहास, वाहु प्रसार (गलवाहियाँ), परिरम्भण, चुम्बन आदि नर्म क्रियाओं का व्यवहार करके उनके चित्तों में अनङ्ग उद्दीपन भी करते हैं२। इसी प्रकार गोपियाँ भी उनसे मिलन के समय अभिलाष भाव से मिलती हैं और रमण के प्रति जैसी चेष्टाएँ प्रियतमा की होनी चाहिये वही सब करती भी हैं। (देखिये श्रीमद्भागवत स्कन्ध १० अध्याय ३२ श्लोक ४,५,६,७,८ एवं स्क० १० अ०३२ श्लोक ११,१२,१३,१४।) गोपियों के आगमन के पश्चात् अन्तर्धान हो जाने के कारण वे श्रीकृष्ण को उलाहना भी


१-देखिये- एवं शशाङ्कांशु विराजिता निशाः, स सत्यकामोऽनुरताबलागणः। सिषेव आत्मन्यवरुद्ध सौरतः सर्वाः शरत्काव्य कथा रसाश्रयाः।। -श्रीमद्भा० १०/३३/२६ २. देखिये- बाहुप्रसार परिरम्भ करालकोरु- नीवीस्तनालभननर्म नखाग्रपातैः। क्ष्वेल्यावलोक हसितैर्व्रज सुन्दरीणा- मुत्तम्भयन्न्रतिपतिं रमयाञ्चकार।। -श्रीमद्भा० १०/२९/४६