हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० • • हित चौरासी फेरते हुए अपनी भृकुटियों के नर्त्तन से कामदेव को भी नचा दिया- (लज्जित करके थकित कर दिया ।) साथ साथ तत्ता थेई, ता थेई' इन रास नृत्य सञ्चालक शब्दों के उच्चारण पूर्वक नृत्य की नव नव गतियों को लेती हुईं प्रियतम ब्रजराज किशोर को भी उन्होंने रिझा लिया, तब समस्त उदार नृपतियों के भी चूड़ामणि (श्रीलालजी) ने सुख वारिद की मानो वृष्टि सी कर दी। वह क्या वृष्टि की ? यह कि उन्होंने अपने प्रेम भाव का दान-आलिङ्गन, चुम्बन,; एवं परिरम्भण यथोचित रूप से समस्त युवति वर्ग को दिया किंवा उन युवतियों ने प्राप्त किया। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि इस आनन्द को देखकर नभ नायक इन्द्र राज पुष्प वृष्टि करते हुए दुन्दुभि बजा रहे हैं। इस प्रकार रसिक श्रीकृष्ण राधापति एवं श्रीराधा का यश वितान समस्त जगत् (विश्व) में छा गया। टिप्पणी-आलिंगन चुंबन परिरंभन उचित जुवति जन पायौ - श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के रस सिद्धान्त के अनुसार श्रीराधा नवल किशोरी ही एकमात्र प्रियतमा हैं श्रीलालजी की; अन्य नहीं। ये नित्य विहारी श्रीराधा के अनुकूल एवं स्वाधीन पति हैं, बहुनायक नहीं। परिकर की अन्य सखियाँ दासियाँ हैं जो श्रीलालजी में प्रियतम भाव रखती हुईं सेवा की ही मात्र अधिकारिणि हैं। वे रस विलास साहायिका अवश्य हैं पर भोग्य-भोक्ता सम्बन्ध तो केवल युगल किशोर तक ही सीमित है। युगल के मिलन, भोग एवं समस्त सुखों का आयोजन करना ही सखियों का पूर्ण सुख है, क्योंकि सखियाँ पूर्णतया तत्सुखित्व भाव की प्रति मूर्त्ति हैं। किन्तु आज महारास के सुखोत्सव में सखियों ने रसिक प्रियतम श्रीलालजी की स्वेच्छा से (अपनी आकाङ्क्षा से नहीं) आलिङ्गन, चुम्बन, परिरम्भण, भ्रूकटाक्ष स्पर्श, हास आदि जाने कितने प्रकार से सुख प्राप्त किये हैं, अथवा उन्हें श्रीरसिक शेखर ने दिये हैं। श्रीकृष्ण एवं सखियों के इस दान सम्मान से उदार हृदया श्रीराधा सर्वेश्वरी स्वामिनी संतुष्ट हैं, सुखी हैं और उल्लसित हैं। वे अन्य अन्य सुरत दुःखिता नायिका की भाँति व्याकुल नहीं है। क्योंकि वे जानती हैं कि ये सखियाँ भी तो मेरा ही स्वांश रूपा हैं अतः स्वजन ही क्यों ? आत्मवत्