हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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१३२ • • हित चौरासी पाये जाते हैं। बहुनायक श्रीकृष्ण को बहुत कुछ कहा समझा जाता है चूँकि ये सभी भाव जगत् से परे और उस प्रेम राज्य के ही हैं, फिर भी अत्युज्ज्वल नित्य विहार और सर्वोपरि तत्सुखित्व से तो निम्न स्तर में ही हैं। तभी तो श्रीव्यास जी ने कह दिया- नवधा लौं सब भक्ति उबीटी, रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभी की।। इस नित्य विहार परायण अनन्य सभा की 'रहनि कहनि' की यही पृथकता है कि वह पूर्ण तत्सुख परायण है।
- ३२ - अवतरण- प्रेम धाम श्रीवृन्दावन की अभिराम कुञ्ज के अन्तर्भाग में एक सुन्दर पुष्प पर्य्यङ्क बिछी हुई है। उस पर रसिक युगल किशोर पौढ़े हुए हैं और हास परिहास, वक्र अवलोकन, कच कुच स्पर्श, एवं आलिङ्गन आदि क्रीड़ाओं का सुख आस्वादन कर रहे हैं। समस्त वृन्दावन पुष्पों से सज सा रहा है। आकाश में चन्द्र देव क्रमशः ऊपर की ओर उठते हुए अपनी अमृतमयी शारदीय किरण मालाओं के हार-मृदु मृदु हार श्रीवन को अर्पित करते जाते हैं। शीतल पवन अपनी मन्द गति से सुगन्ध का प्रसार सा कर रहा है। ऐसे सुखमय अवसर राका रजनी में युगल किशोर अपने विशद विहार अनिर्वचनीय रस क्रीड़ा में संलग्न हैं, जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी अपनी निकट वर्त्ती सहेली-ललितादिकों से कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।। सुभग बनी निसि सरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम।। खंडत अधर करत परिरंभन, ऐंचत जघन दुकूल।