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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

हित चौरासी • • १३३ उर नख पात तिरीछी चितवन, दंपति रस सम तूल॥ वे भुज पीन पयोधर परसत, वाम दृशा पिय हार। वसननि पीक अलक आकर्षत, समर श्रमित सत मार॥ पलु पलु प्रवल चौंप रस लंपट, अति सुंदर सुकुमार। (जै श्री) हित हरिवंश आजु तृन टूटत हौं बलि विसद विहार॥३२॥ भावार्थ—आज वन (श्रीवृन्दावन) में श्यामा श्याम क्रीड़ा कर रहे हैं। शरद की बड़ी सुन्दर चाँदनी पूर्ण रात्रि है और वैसी ही रुचिर अभिराम कुञ्ज है। (उस कुञ्ज भवन के खिलाड़ी श्रीराधा मोहन) युगल (दम्पति) रस विलास में समतुल्य हैं (कोई किसी से किसी बात में कम नहीं है।) परस्पर एक दूसरे के अधरों का चुम्बन, खण्डन, करते श्रीवपु का परिरम्भण (आलिङ्गन) करते और जघन भाग से (प्रियतम प्रियतमा का) दुकूल खींचते हैं, पश्चात् फिर भी उर (उरोजों) पर नखाघात करते एवं कटाक्ष पूर्ण नयनों से विलास पूर्वक अवलोकन करते हैं। जब कभी प्रियतम (अपनी प्रिया के) बाहु मूल और पुष्ट पयोधरों का स्पर्श करने लगते हैं तब श्रीप्रिया जी अपनी निगाहों से तिरछा अवलोकन करती हुई उनके हार का—उर स्थित हारावली के बहाने हृदय देश का स्पर्श करने लगती हैं। फिर कभी वस्त्रों में (ताम्बूल) पीक लगा देते, कभी ललित अलकों का ही आकर्षण करने लगते हैं और फिर शत शत स्मर व्यथा से उत्तप्त होकर रति विहार युद्ध से थकित हो रहते हैं किन्तु फिर भी अत्यन्त सुन्दर सुकुमार युगल रस लम्पट किशोर के मनों में रस विलास की चौंप प्रति पल प्रवल ही होती रहती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि आज विहार अत्यन्त विशद है जिस पर तृण टूटते हैं अर्थात् जिस पर समस्त परिकर न्यौछावर है मैं भी उर वलिहार हूँ।