हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० • • हित चौरासी वाली सखियाँ युगल की मनोहर शृङ्गार पूर्ण छवि का दर्शन करके मुग्ध हो जाती है। तभी श्रीहित सखीजी अन्यान्य सखियों से श्रीप्रियाजी की उक्त दर्शनीय छवि का वर्णन करती हुई, कहती हैं- सारङ्ग मूल-आवति श्रीवृषभानु दुलारी। रूप रासि अति चतुर सिरोमनि अंग अंग सुकुमारी।। प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित नील बरन तन सारी। गुंथित अलक तिलक कृत सुंदर सैंदुर माँग सँवारी।। मृगज समान नैन अंजन जुत रुचिर रेख अनुसारी। जटित लवंग ललित नासा पर दसनावलि कृत कारी।। श्रीफल उरज कँसूभी कंचुकि कसि ऊपर हार छवि न्यारी। कृस कटि उदर गँभीर नाभि पुट जघन नितंबनि भारी।। मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज स्याम अंस पर डारी। (जै श्री) हित हरिवंश जुगल करिनी गज विहरत वन पिय प्यारी।। भावार्थ-(श्रीहित सखी ने कहा- हे सखियो !) अत्यन्त चतुर शिरोमणि, रूप की राशि (अपार रूपवती) एवं अङ्ग-अङ्ग में परम सुकुमारी श्रीवृषभानु दुलारी आ रही हैं। उन्होंने प्रथम तो उबटन पूर्वक स्नान किया है और तत्पश्चात् अपने श्रीअङ्ग पर नील वर्ण की सारी सज्जित की है। उनकी अलक-लटें गुँथी हुई हैं, ललाट पटल पर सुन्दर तिलक किया गया है और सिन्दूर से माँग भी सँवारी गयी है। श्रीराधा के मृग छौने के से सुन्दर नयन अञ्जन से युक्त कजरारे है और (उन नयनों की नोकों से आगे क्रमशः आगे बढ़ती हुई) रुचिर (कज्जल) रेखा (नेफा) अनुसारी गयी है। सखि ! ललित नासिका पुट पर मणि-जटित लवङ्ग (स्वर्ण पुष्प) शोभित है और दन्त पंक्ति भी (ताम्बूल, मिस्सीआदि रङ्गों से रँगी हुई गहरी ललामी से) राग रञ्जित सी दिख रही है। कँसूभी कञ्चुकि के द्वारा कसे हुए श्रीफल जैसे उरोजों के ऊपर लहराते हुए हारों की छवि कुछ न्यारी (विलक्षण) ही है। अहा ! कटि तो अत्यन्त कृश (पतली) है, उदर पर गम्भीर नाभि कुण्ड है और जघन तथा नितम्ब पुष्ट हैं-विशाल हैं।"