हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १६१ श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "वृषभानु दुलारी विविध भूषणों से भूषित अपनी कमल नाल सी कमनीय बाहु लता को श्रीश्याम सुन्दर के कन्धे (अंस) पर डाल कर ऐसे विहार कर रही हैं जैसे कोई गज गजी-करि करिणी युगल। हे सखि ! इस प्रकार श्रीवन में पिय प्यारी (सदा) विहार ही करते रहते हैं।" – ४६ – अवतरण-श्रीवृन्दावन के सघन निकुञ्ज में युगल किशोर किसी अनिर्वचनीय एकान्त सुरत विहार में निमग्न हैं। श्रीहित सखी उसका अवलोकन करके परम आनन्दित हो रही हैं और सखियों से वर्णन करके उस रस का मानों प्रवाह प्रवाहित कर रही हैं- सारङ्ग मूल-विपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि, स्याम स्यामा मिले सरद की जामिनी। हृदै अति फूल समतूल पिय नागरी, करिनि करि मत्त मनौ विविध गुन रामिनी॥ सरस गति हास परिहास आवेस बस, दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी। (जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे, प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥४६॥ भावार्थ-(श्रीहित सहचरि ने कहा-"सखी ! आज) शरद की रात्रि में श्रीश्याम और श्यामा वृन्दावन की सघन कुञ्ज में मिले हैं, वे परस्पर गलबहियाँ दिये रुचि पूर्वक रति विलास की क्रीड़ा कर रहे हैं। अरी! रस विलास में समतुल्य (बराबर) प्रियतम एवं नागरी दोनों के हृदयों में अपार प्रसन्नता है [वे रति केलि की रुचि के कारण ऐसे प्रतीत होते हैं] मानो मत्त करि एवं करिणि नाना प्रकार की गुण कला पूर्वक रमण कर रहे हों। (उस रति केलि में) कामिनि (श्रीप्रियाजी) ने अपनी सरस गति, हास परिहास (प्रेम) आवेश और कोक रस के बल से कामदेव के दल के दल (समूहों को) दलित कर दिये-मथ डाले हैं।"