हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ • • हित चौरासी रति विनोद जामिनि जगे, सिथिल अटपटे बैन। अँग अँग अरसाने सबै, सरसाने सखि नैन।। सीस सीस तरें वाहु दै, जुरे मिथुन मुख चाहि। निसिदिन जीवन सखिनु कै, यहै परम सुख आहि।। हाँहिं सकल जौं गात, रौम रौम रसना सहित। तऊ कह्यौ नहिं जात पिय प्यारी कौ प्रेम रस।। यह है रस की नित्य नवीनता ! (४) नवल स्याम वृषभानु किसोरी–श्याम सुन्दर श्रीकृष्ण और गौर वदनि नवल किशोरी राधा का वास्तविक रूप क्या है; इसे वेद, उपनिषद, पुराण और महापुरुषों के अनुभव पूर्ण वाक्यों से अच्छी तरह समझा जा सकता है; अतः यहाँ संक्षेप में इतना ही कि ये दोनों अतर्क्य, अचिन्त्य, अव्यक्त एवं परात्पर ब्रह्म हैं—उस 'रसो वै सः के सगुण साकार विग्रह है। इस बात को यहाँ छोटे से स्थान में लिखने की आवश्यकता नहीं है। कहने की आवश्यकता केवल इतनी ही है कि यह पूर्ण पुरातन ब्रह्म; पुरातन होकर भी नित्य नवीन है नित्य–युवा है, किशोर है। इसे महा पुरुष गण किस प्रकार प्रकट करते हैं देखिये– श्रीराधे नव कुञ्ज नागरि तव क्रीताऽस्मि दास्योत्सवैः —श्रीराधा सुधा निधि अर्थात् “हे नव कुञ्ज नागरि' राधे! मैं आपके दास्य सुख में बिक चुकी हूँ। यहाँ नव कुञ्ज नागरि पद दृष्टव्य है। इसी प्रकार– "माई ! सहज जोरी प्रगट भई जु रंग की स्याम गौर, घन दामिनि जैसे। पहले हुती, अबहूँ है, आगैहुँ रहिहै; न टरिहै तैसे।।" —श्रीस्वामी हरिदासजी इसी तरह श्रीध्रुवदासजी कहते हैं– नित्य किशोरी नित्य किसोर। नित वृंदावन नित निसि भोर।। नित्य सहचरी नित्य विनोद। नित आनँद बरसत चहुँ कोद।।