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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

हित चौरासी • • १७६ अन्त में नवल नागरि नवल जुवराज। नव नव वन, घन क्रीडंत, नव निकुंज विलसंत सर्वसु। नव नव रति नित नित बढ़त, नयौ नेह नव रंग नयौ रस।। नव विलास कल हास नव मधुर सरस मृदु बैन। नव किसोर हरिवंश हित नवल नवल सुख चैन।।

  • श्रीदामोदर सेवक जी श्रीवृन्दावन परिकर की सभी वस्तुएँ, सब भाव और लीलाएँ सदा नित्य नवीन के साथ साथ रसमय और आनन्द मय हैं। यहाँ श्रीराधा नवीन हैं, उनके प्रियतम श्रीकृष्ण नित्य नवीन हैं। इसी प्रकार सखियाँ खग, मृग और अन्यान्य परिकर भी नित्य नवीन हैं। नित्य विहार में वेणु, वाद्य, सेवा सामग्री, कुञ-गृह, यमुना, सरोवर, गिरिवर, गान, तान, राग, रङ्ग, क्रीड़ा हाव भाव केलि विलास, हास परिहास, चितवन, रूप, सौन्दर्य्य, माधुर्य्य आदि सब नवीन-नित्य नवीन और रसमय हैं किं बहुना ? ये सभी एक रसमय उन्नत नित्य नवल युगल किशोर के ही रूप हैं अतः तत्स्वरूप हैं।
  • ५५ - अवतरण-इस पद में श्रीहिताचार्य्य चरण दो दामिनियों की होड़ (स्पर्धा) के रूपक से स्वामिनि श्रीराधा के रूप सौन्दर्य्य की श्रेष्ठता का प्रकाश कर रहे हैं। रूपक यों है- दो चपला हैं; एक आकाश स्थित घन में निवास करने वाली तडित; दूसरी भूतल स्थित (गौराङ्गीश्री राधा ।) ये दोनों रूप, गुण, स्वभाव में प्रायः समान हैं या नहीं इसी का निर्णय होना है इस स्पर्धा में। दोनों की स्पर्धा के विषय केन्द्र हैं श्याम घन (सजल मेघ और श्रीकृष्ण जो प्रायः एक रूप हैं।) शर्त्त क्या है ? यह कि हम दोनों में से कौन नव घन श्याम (घटा) को विचलित कर सकता है।