भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

१८० • • हित चौरासी इस प्रकार दोनों चपलाएँ आनन्द के उत्साह विनोद रस में तल्लीन होकर अपने अपने प्रयास में लग गयीं। एक आकाश तड़ित् सजल घन घटा से अपना विजय प्रयास करने लगी और दूसरी भूतल विराजित नव जलधर वपु श्रीकृष्ण से। मलार मूल-आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं। बिच लै स्याम घटा अति नौंतन, ताके रंग रसीं॥ एक चमकि चहुँ ओर सखी री, अपने सुभाइ लसी। आई एक सरस गहनी में, दुहुँ भुज बीच बसी॥ अंबुज नील उमै विधु राजत, तिनकी चलन खसी। (जै श्री) हित हरिवंश लोभ भेटन मन, पूरन सरद ससी॥५५॥ भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-“सखी !) आज दोनों दामिनियाँ (एक आकाश स्थित बिजली एवं दूसरी भूतल स्थित तड़ित् वपु गौराङ्गी श्रीराधा) मिल कर होड़ लगा चुकी हैं। (होड़ यह है।) कि अत्यन्त नूतन श्याम घटा को विचलित करें। बस; इसी होड़ की उमङ्ग में (दोनों) डूब रही हैं। हे सखी ! [होड़ के अनुसार क्रिया यह प्रारम्भ हुई कि] एक (आकाश स्थित दामिनि) तो चारों ओर चमक कर फिर अपने (पूर्ववत) स्वभाव में ही जा मिली, (अर्थात् जैसे कि सर्व काल वह चमक कर घन में समा जाती थी उसी प्रकार आज भी वह घन में समा गयी।) (मानो वह अपनी सारी करतूत कर चुकी। अब दूसरी भूतल स्थित दामिनि श्रीराधा ने क्या किया ? वह भी चमकी पर) एक रस मय पकड़ (बन्धन) में आ गयी और (श्याम घन की) दोनों भुजाओं के बीच में जा बसी। [श्याम घन की दोनों भुजाओं के बीच जा बसने पर आकाश तड़ित् ने सोचा कि मेरी, इसकी स्थिति समान रही पर जा बसने के उपरान्त उसने क्या किया; इस प्रकार है-] (उस गौराङ्गी दामिनि में एक आश्चर्य था कि उसके विधु (चन्द्र मुख) पर चार कमल दो नील और दो लाल-शोभित थे; (अर्थात् दामिनि श्रीप्रियाजी के श्रीअङ्गों से श्रीलालजी की नील कमल वत् दो भुजाएँ लिपट रही थीं और उनके चन्द्र वदन पर लाल कमल जैसी अनुराग रँगी अरुणिम आँखें लगी थीं