हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ • • हित चौरासी भावार्थ – श्रीहित सजनी आशीर्वाद देती हैं–'हे नागरी ! (श्रीराधा) हे श्याम ! (श्री कृष्ण !) मैं आप पर वलिहार जाऊँ। (आप दोनों) वृन्दावन की सुन्दर कुञ्ज कुटी में रात दिन–निरन्तर इसी प्रकार आनन्द मय रङ्ग विहार ही करते रहो ! निरन्तर हास विलास एवं सुरत रस के सिञ्चन द्वारा पशुपति शिवजी के द्वारा जलाये गये (दग्ध किये गये) कामदेव को जीवन दान देते हुए हे सकल सुख धाम ! हमारे लोल लोचन रूप भ्रमरों को सफल कीजिये न !' (अर्थात् आप दोनों स्वच्छन्द भाव से रति विलास करें और हम उसका दर्शन करके सुखी हों।) – ५७ – अवतरण–वसन्त की बहार है। समस्त वन विविध प्रसूनों से सुसज्जित है। मन हरण बसन्ती वायु झूम झूम कर बह रहा है। सखियों ने अनेकों कनक भाजनों में विविध भाँति के रङ्ग घोल रखे हैं, सबके करों में ललित पिचकारियाँ शोभा पा रही हैं। गुलाल, अबीर और बन्दन की झोलियाँ लटका रखी हैं सबने अपनी अपनी फेंट में। यदि एक ओर से पिचकारी रङ्ग फेंकती है, तो दूसरी ओर से चल पड़ती है अबीर और गुलाल की भरी मुट्ठी। आकाश ढँक जाता है, अबीर गुलाल की रङ्ग बिरङ्गी धूल से। इसके सिवाय दोनों पक्ष–श्रीलालजी और श्रीप्रियाजी के अङ्ग प्रत्यङ्गों के हाव भाव, चितवन, कटाक्ष, हास परिहास आदि की जो होली है, वह तो होली ही है, उसका रङ्ग, सुख और आस्वादन तो सहृदय रसिक जनों के लिये ही हृदय–गम्य है। अब इस रस केलि का वर्णन श्रीरसिकाचार्य्य चरण हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु इस प्रकार करते हैं– गौरी मूल–प्रथम जथामति प्रनऊँ (श्री) वृंदावन अति रम्य। श्रीराधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य।। वर जमुना जल सींचन दिनहीं सरद बसंत। विविध भाँति सुमनसि के सौरभ अलिकुल मंत।। अरुन नूत पल्लव पर कूँजत कोकिल कीर। निर्त्तनि करत सिखी कुल अति आनंद अधीर।।