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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

हित चौरासी • • १८३ बहत पवन रुचिदायक सीतल मंद सुगंध। अरुन नील सित मुकुलित जहँ तहँ पूषन बंध॥ अति कमनीय विराजत मंदिर नवल निकुंज। सेवत सगन प्रीतिजुत दिन मीनध्वज पुंज॥ रसिक रासि जहँ खेलत स्यामा स्याम किसोर। उभै बाहु परिरंजित उठे उनींदे भोर॥ कनक कपिस पट सोभित सुभग साँवरे अंग। नील वसन कामिनि उर कंचुकि कसुँभी सुरंग॥ ताल रबाब मुरज उफ बाजत मधुर मृदंग। सरस उकति गति सूचत वर बँसुरी मुख चंग॥ दोउ मिलि चाँचरि गावत गौरी राग अलापि। मानस मृग बल बेधत भृकुटि धनुष दृग चापि॥ दोऊ कर तारिनु पटकत लटकत इत उत जात। हो हो होरी बोलत अति आनँद कुलकात॥ रसिक लाल पर मेलति कामिनि वंदन धूरि। पिय पिचकारिनु छिरकत तकि तकि कुंकुम पूरि॥ कबहुँ कबहुँ चंदन तरु निर्मित तरल हिंडोल। चढ़ि दोऊ जन झूलत फूलत करत किलोल॥ वर हिंडोर झँकोरनि कामिनि अधिक डरात। पुलकि पुलकि वेपथ अँग प्रीतम उर लपटात॥ हित चिंतक निजु चेरिनु उर आनँद न समात। निरखि निपट नैननि सुख तृन तोरतिं बलि जात॥ अति उदार विवि सुंदर सुरत सूर सुकुमार। (जै श्री) हित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल विहार॥५७॥ भावार्थ—मैं (सर्व) प्रथम अत्यन्त रमणीय श्रीवृन्दावन का अपनी बुद्धि के अनुसार प्रणयन (वर्णन) करता हूँ, जो (वृन्दावन) श्रीराधिका-कृपा के विना प्रायः सभी के मनों के लिये अगम्य (प्रवेश न पा सकने के योग्य) है। जो जमुना जल सिञ्चित है, जहाँ निरन्तर शरद् एवं वसन्त ऋतुएँ रही ही आती हैं और