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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 275 में से

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पृष्ठ 190

१८४ • • हित चौरासी भ्रमर समूह से युक्त विविध प्रकार के पुष्पों का सौरभ भी छाया रहता है। कहीं लाल लाल आम के पल्लवों पर (बैठे) कोकिल और कीर कूज रहे हैं, तो कहीं अत्यन्त आनन्द से अधीर मयूर समुदाय ही नृत्य कर रहा है। (समस्त वृन्दावन में) रुचि दायक, शीतल एवं सुगन्ध मय पवन मन्द मन्द गति से बह रहा है और जहाँ-तहाँ (जलाशयों में), अरुण, नील एवं श्वेत कमल खिल रहे हैं। (ऐसे रमणीय वृन्दावन में) अत्यन्त कमनीय कोई नव निकुञ्ज मन्दिर शोभित है; जिसका सेवन निरन्तर ही अपने परिकर के सहित मीन केतु-काम देवों का समुदाय करता रहता है। जहाँ रसिक राशि किशोर श्रीश्यामा श्याम खेलते रहते हैं। आज दोनों (रसिक किशोर) प्रातः काल ही परस्पर वाहु परिरञ्चित (गल बहियाँ दिये) उनींदे उठ पड़े हैं। (श्रीलालजी के) सुन्दर श्याम अङ्ग पर कनक वर्ण का रेशमी वस्त्र शोभित है और कामिनि (श्रीप्रियाजी) के (गौर अङ्ग पर) नील वसन एवं उर कसूँभी कञ्चुकि। (होली खेल के समय) मधुर मधुर मृदङ्ग ताल, रबाव मुरज एवं डफ बज रहे हैं और इसी प्रकार वंशी और मुखचङ्ग (अपने स्वरों में) रस पूर्ण उक्तियों (नृत्य सम्बन्धी बोलों जैसे ता-ता थेई, ताथेई आदि) एवं गतियों (उरप तिरप सुधङ्ग आदि) की सूचना करते हैं। दोनों (प्रिया प्रियतम) हिल मिलकर गौरी राग के आलाप लेकर चाचरि गान करते एवं परस्पर भौंहों के धनुष तथा दृगों से भी बल पूर्वक (एक दूसरे के) मन रूपी मृगों को बेधते (घायल करते) हैं। पश्चात् दोनों अपने अपने हाथों की ताली पटकते और लटकते मटकते इधर से उधर और उधर से इधर आते जाते हैं एवं अत्यन्त आनन्द से उल्लसित होते हुए (कुलकते हुए) "हो हो होरी" ऐसा बोलते हैं। (होली में) कामिनि (श्रीराधा) रसिक लाल (श्याम सुन्दर) पर बन्दन (सिन्दूर) धूल डालती और प्रियतम ताक ताक कर (दाव घात पूर्वक) उन पर केशर धूल फेंकते और पिचकारी छिड़कते हैं। फिर कभी कभी वे (युगल किशोर) चन्दन तरु पर तरल हिण्डोल की रचना करते हैं और (उस पर) दोनों जन चढ़कर झूलते एवं प्रसन्न होते हुए किलोलें करते हैं। हिण्डोल की लम्बी झूलों (झँकारों) से (भीरु) कामिनि अधिक अधिक डरती तथा बार बार (भय से) रोमाञ्चित् होकर कम्पित अङ्गों से प्रियतम

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