हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १८५ के हृदय में लिपट चिपट जाती हैं। (युगल सरकार की इस आनन्द क्रीड़ा के दर्शन से) हित का चिन्तन करने वाली (प्रेममयी) अपनी निज दासियों (सखियों) के हृदय में आनन्द समाता नहीं—उमड़ उमड़ चलता है। वे इस आत्यन्तिक सुख का अपनी आँखों दर्शन करके उस पर तृण तोड़ती¹ और वलिहार जाती हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं-“हे अति उदार और परम सुन्दर युगल किशोर ! हे सुरत क्रीड़ा के शूरवीर सुकुमार युगल वर !! आप दोनों दिन दिन (नित्य निरन्तर) इसी प्रकार अविचल विहार ही करते रहें, (यही हमारा परम सुख है।”) १. तृण तोड़ने का यह भाव है कि यह वस्तु सर्वश्रेष्ठ है एवं इसे किसी की नजर न लग जाय। (१) टिप्पणी— “प्रथम जथामति प्रनऊँ श्रीवृन्दावन अतिरम्य।” इस पंक्ति में प्रनऊँ शब्द का अर्थ अनेकों टीकाकारों ने 'प्रणाम' किया है। मुझे इससे कोई हुज्जत नहीं कि यह अर्थ क्यों ? किन्तु मुझे 'प्रनऊँ' का प्रणाम अर्थ इस पङ्क्ति में जाने क्यों स्वीकार नहीं। मुझे तो इसका अर्थ प्रणयन, वर्णन या अनुशीलन ही जँचा है। ऐसा क्यों ? मैं इसका स्पष्टीकरण करने की कोशिश करूँगा। अस्तु; 'प्रथम जथामति... रम्य', इस पूरी पङ्क्ति के सरलार्थ पर ध्यान दें और प्रनऊँ का प्रणाम अर्थ लेकर सरलार्थ यह होगा— 'मैं अपनी बुद्धि के अनुसार अत्यन्त रमणीय श्रीवृन्दावन को प्रथम ही प्रणाम करता हूँ।' यहाँ विचार करने की बात है कि क्या किसी को यथामति (बुद्धि के अनुसार) प्रणाम किया जाता है या हृदय की श्रद्धा के अनुसार ? देखा तो यही जाता है कि लोग बुद्धि के अनुसार प्रणाम नहीं करते वरं श्रद्धा और हृदय के अनुसार करते हैं। प्रणाम मति का विषय नहीं जो यथामति किया जाय। प्रणाम में मति की यथा तथ्यता की कोई आवश्यकता ही नहीं ! ऐसा भी नहीं होता कि