हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ • • हित चौरासी बुद्धिमानों का प्रणाम विशेष और मूर्खों का लघु होता हो। यदि मतिमान् मनुष्य हृदय हीन है; तो उसका प्रणाम भी भाव रहित और केवल शिष्टाचार मात्र ही रह सकता है और यदि मूर्ख मनुष्य भावुक है ; तो वह अपने प्रणाम में हृदय के सम्पूर्ण भावों का योग करके अपने (प्रणाम) (नमन) को भी महान् बना सकता है। अतः कहना होगा कि प्रणाम हृदय श्रद्धा और नम्रता का शरीर क्रिया में परिणत रूप है। जिसका मस्तिष्क से कोई सम्बन्ध है ही नहीं। तब उक्त पद में 'जथा मति प्रनऊँ' का अर्थ 'यथामति प्रणाम करता हूँ' ऐसा न करके 'यथा बुद्धि प्रणयन करता हूँ; ऐसा अर्थ मेरी अल्प मति में अधिक उपयुक्त होगा। पाठक गण विचार करें- किसी विषय के वर्णन, प्रकाश या उल्लेख करने का नाम प्रणयन है। यह प्रणयन शब्द संस्कृत व्याकरण की पृण् धातु से बना है; जिसका अर्थ है- यन् प्रत्यय है। पश्चात् इस धातु से अनेकों शब्दों की सृष्टि हुई, यथा-प्रणयन्, प्रणेता, प्रणीत आदि। जब यह कहा जाता है कि अमुक सज्जन इस ग्रन्थ के प्रणेता हैं या यह ग्रन्थ अमुक द्वारा प्रणीत है; तो इसका यही अर्थ समझा जाता है कि वे इस ग्रन्थ के लेखक हैं या यह ग्रन्थ अमुक महाशय के द्वारा लिखा गया है। तब प्रणेता या प्रणीत का अर्थ लेखक और लिखित ही किया जाता है इसी प्रकार 'मैंने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है' इसका भी यही अर्थ है कि मैंने इस ग्रन्थ का वर्णन, अनुशीलन या लेखन किया है जो मेरी अपनी बुद्धि के अनुसार हुआ है। ऐसी दशा में यथामति प्रणयन या 'जथामति प्रनऊँ' कुछ ठीक ठिकाने सा दिखता है। अब पाठक 'प्रनऊँ' का प्रणयन पर्याय करके उक्त पङ्कि का अर्थ लगा जावें- 'प्रथम जथा मति प्रनऊँ श्रीवृंदावन अति रम्य' अर्थ-"मैं प्रथम अपनी बुद्धि के अनुसार अत्यन्त रमणीय श्रीवृन्दावन का प्रणयन (वर्णन) करता हूँ।" अब 'प्रणऊँ' शब्द का प्रणयन या वर्णन-अर्थ लेकर कार्य कारण सङ्गठित बुद्धि से सम्पूर्ण पङ्कि का सङ्गठन देखिये कि कितना उपयुक्त है यह प्रणयन या वर्णन अर्थ-