हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 193, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १८७ पहले कहा जा चुका है कि प्रणयन या वर्णन यथा मति किया जाता है क्योंकि वर्णन, अनुशीलन या प्रणयन से बुद्धि या मस्तिष्क का सम्बन्ध है। जिसके पास जैसी बुद्धि होगी वह उसी के अनुसार किसी भी विषय का वर्णन-प्रणयन कर सकेगा। हृदय से सम्बन्ध रखने वाले भाव प्रधान विषयों के वर्णन में भी कर्त्तव्य कार्य तो बुद्धि का ही होता है। भाव हृदय के होते हैं पर शब्द योजना और विषय का प्रकाश तो मस्तिष्क ही अपने अनुसार करता है; वहाँ पर हृदय का कोई कार्य नहीं रहता। और यदि हृदय भावुक और सरस भी है पर वर्णन करने के लिये मति नहीं है तो वर्णन नहीं किया जा सकता। अन्ततोगत्वा कहना पड़ेगा कि 'यथामति प्रनऊँ' का 'बुद्धि के अनुसार वर्णन करता हूँ' यही अर्थ अधिक सुसङ्गठित है। (२) टिप्पणी- दोउ मिलि चाँचरि गावत गौरी राग अलापि। मानस मृग बल बेधत भृकुटि धनुष दृग चापि॥ इनमें प्रथम पंक्ति के 'अलापि' को कई प्राचीन प्रतियों में अलाप लिखा गया है और तदनुसार दूसरी पङ्क्ति के 'चापि' को चाप। इसी से छन्द के अर्थ में बड़ा भारी अन्तर आ जाता है। पहली पङ्क्ति में 'अलाप' एक संज्ञा है और 'अलापि' है पूर्व कालिक क्रिया; जिसका अर्थ है-आलाप कर या अलाप लेकर। अब दूसरी पंक्ति में चाप होना चाहिये या 'चापि' इस पर विचार करें- पूर्व पंक्ति के 'अलापि' तुकान्त के अनुसार चापि ही ठीक है किन्तु अर्थ और भावार्थ के विचार से भी यह चापि ठीक है या नहीं; यह विचारणीय है। 'मानस मृग बल बेधत भृकुटि धनुष दृग चापि' इसका अर्थ करते समय कई टीकाकारों ने 'चापि' का अर्थ वाण करके भृकुटि धनुष में दृग वाण के चढ़ाये जाने का आशय सिद्ध किया है, किन्तु जहाँ तक शब्द संसार का विस्तार है, वहाँ तक चापि का अर्थ वाण नहीं है, ऐसा मेरा स्मरण और आग्रह है। तब 'चापि' का वाण अर्थ करके पङ्क्ति को सही बिठा लेना कुछ और बात है। एक प्राचीन टीकाकार लिखते हैं-