भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

हित चौरासी • • १८६ ये हैं वे दृग चापि (विशेष आँखें) जिनसे लालजी का मन मृग बेधा गया- वह चितवनि औरै कछू जेहिं बस होत सुजान। अस्तु; यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि ऐसी कितनी ही उपमाएँ हैं, जहाँ उपमा और उपमेय दोनों को एकत्र करने की आवश्यकता नहीं रहती। केवल एक के ही रख देने से दोनों का काम चल जाता है। देखिये- नेत्रान्तस्ते विकीर्णाद्भुत कुसुम धनुश्चण्ड सत्काण्ड कोटिः।

  • श्रीराधा सुधा निधि अर्थात् "आपके नेत्र कोणों से पुष्प धन्वा कामदेव के कोटि कोटि प्रचण्ड शर विखरते रहते हैं।" यहाँ केवल 'कुसुम धनुः तो वताया किन्तु वाणों का विशेषण 'चण्ड' और संख्या सत्काण्ड कोटि' कहकर सङ्केत कर दिया गया। इसी प्रकार हित चौरासी के इक्यावनवें पद में केवल बहुत सी उपमाएँ दी गयी हैं उपमेय का पता तक नहीं है पर वे सब उपमेय उपमाओं के सहारे पकड़ में आ जाते हैं, नव नारंग कनक हीरावलि विद्युत सरस जलज मनि गोरी। पूरित रस पीयूष जुगल घट कमल कदलि खंजन की जोरी ।। कहने का तात्पर्य यह कि "चापि" का विशेष (खास) ऐसा अर्थ लेकर पंक्ति का अर्थ करने से कोई खास आपत्ति नहीं आती। जैसी कि चापि का वाण अर्थ लेने में आती है। कहीं कहीं 'चापि' का अर्थ चँपा कर या चाँप (दबा) कर ऐसा लिया गया है और सम्पूर्ण पङ्क्ति को यों बिठाया गया है- अपनी भृकुटि धनुषों से दृग [रूपी वाण] दबाकर (चँपाकर) वे (प्रियाजी) वलात्कार पूर्वक (लालजी के) मानस मृग का वेधन कर रही हैं। यहाँ दृगों को वाण माना गया है; चूँकि वाण के लिये कोई शब्द नहीं है। 'चापि' का दबाकर अर्थ भी उपयुक्त है पर चापि का वाण पर्याय तो कुछ जँचता ही नहीं। जिन्होंने चापि का पर्याय वाण लिखा; तो क्यों लिखा? वही जानें।