भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

१६० • • हित चौरासी

  • ५८ - अवतरण - शरद् की सुहावनी रात्रियों में जब प्रिया प्रियतम के मिलन की सुख घड़ियाँ हों, नायक का मन मसोस देने वाले नायिका मान की कल्पना भी कितनी दुःख प्रद है; रसज्ञ जन जानते हैं। आज श्रीप्रियाजी मानवती हैं। हित सखी जी मनाते मनाते थक सी गयी हैं। उन्होंने लाख प्रयत्न किये पर प्रियाजी का मान न टूटा, अन्त में कहना पड़ा-“राधिके ! जानती हो इस मान का परिणाम क्या होगा ? मैंने जो तुमसे प्रियतम की दशा कही है, उसे केवल दूती के उद्दीपन वाक्य समझ कर टाल रही हो ! वे तो तुम्हारे बिना अपने जीवन और यौवन को भी नगण्य मान बैठे हैं-उनसे उदास हो चुके हैं। जाकर तुम्हारे न आने का सन्देश कहने का विलम्ब है। फिर क्या होगा..... ?” सखी अञ्चल में मुँह ढाँप फफक कर रो पड़ी। अब मानिनि ने समझी, बड़ी देर में वस्तु स्थिति। तब कहीं मान टूटा। श्रीहित सखी ने कहा श्रीराधा मानिनि से- गौरी मूल-तेरे हित लैन आई, धंन ते स्याम पठाई; हरति कामिनि घन कदन काम कौ। काहे कौं करत बाधा, सुनि री चतुर राधा; भैंटि कैं मैंटि री माई प्रगट जगत भौ।। देखि री रजनी नीकी, रचना रुचिर पी की; पुलिन नलिन नभ उदित रौंहिनी धौ। तू तौऽब सयानी; तैं मेरी एकौ न मानी; हौं तोसौं कहत हारी जुवति जुगति सौं।। मोंहनलाल छबीलौ, अपने रंग रँगीलौ; मोहत विहंग पसु मधुर मुरली रौ। वे तौऽब गनत तन जीवन जौवन तब; (जै श्री) हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ।।५८।।