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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

हित चौरासी • • १६१ भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे कामिनि ! मैं तो केवल तेरे ही कारण (प्रेम वश) तुझे लेने आयी हूँ; मुझे श्याम सुन्दर ने वन से यहाँ भेजा है, तब आप अब चल कर काम की सघन पीड़ा का हरण क्यों नहीं करतीं ? अरी चतुर राधा ! सुन तो सही, (तू ये) अकारण (व्यर्थ) बाधाएँ क्यों उपस्थित करती है ? सखी ! श्रीलालजी से मिलकर जगत् के भय को प्रकट रूप से मिटा डाल । अरी ! देख तो सही, कैसी सुन्दर रास रचना प्रियतम ने की है, कितनी नीकी रात है ? यमुना पुलिन पर कमल खिल रहे हैं और आकाश में रोहिणी पति चन्द्रमा भी उदित है। सखी ! वैसे तो तू बड़ी सयानी (चतुर) है पर तूने आज मेरी एक न मानी ! अरी युवति ! मैं तो सौ सौ युक्तियों के साथ (वे बातें) तुझसे कह कर हार गयी।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र (सखी भाव से) कहते हैं-"हे भामिनि ! मोहन लाल एक तो छबीले हैं दूसरे अपने रङ्ग में रँगीले भी; तिस पर फिर वे मुरली के मधुर स्वर से पशु पक्षियों तक को भी मुग्ध (मोहित) करने वाले हैं। यदि तुम आज चलकर उनका सेवन करोगी तो ही वे अब अपने जीवन और यौवन को कुछ गिनेंगे, (कुछ समझ कर रखना चाहेंगे;) अन्यथा नहीं । टिप्पणी- हरि भजहि भामिनि जौ यहाँ भजहि का भावार्थ 'सेवन करना' ऐसा है; भजन पूजन नहीं। यह शब्द भज् सेवायाम् धातु से बना है अतः सेवन करने का तात्पर्य है यहाँ, प्रियतम को रस दान पूर्वक मिलन सुख देने से। इस रस विलास प्रकरण में भजन क्रिया का लक्षण कुछ और है। श्रीप्रियाजी प्रियतम का भजन करें इसका अर्थ है वे चलकर उनकी विरह ज्वाला, काम पीड़ा शान्त करें। फिर जब मिलन होकर परस्पर में- सरस गति हास परिहास आवेस बस, दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।