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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

१६२ • • हित चौरासी (जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे, प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥ क्रीड़ा प्रारम्भ होती है, तब इस रस विलास प्रकरण का भजन समझा जाता है-भजन क्रिया सम्पन्न होती है।

  • ५९ - अवतरण-अब एक सैद्धान्तिक पद के द्वारा जगत् मिथ्यात्व प्रकाश के साथ श्रीश्यामा श्याम के चरणों की सत्यता का निरूपण करते हैं। इन सत्य स्वरूप चरणों की सत्यता चरणों की प्राप्ति में श्रीश्यामा श्याम के तदीय जन ही प्रधान हेतु है अतएव उनका ही चरणाश्रय महान् और उचित है तथा इस काल व्याल ग्रस्त जगत् से छुड़ा लेने वाला है। अब जो लोग अपने मन को अनेकों स्थानों में नचाते किन्तु युगल सरकार में नहीं लगाते वे कितनी बड़ी भूल कर रहे हैं। उनकी न तो कहीं स्थिति है और न वे सुखी ही हैं। क्योंकि सच्चा सुख तो युगल किशोर के रसिक जनों के श्रीचरणों में है और वही मुमुक्षु जनों के लिये आश्रय ग्रहण करने योग्य हैं। श्रीहिताचार्य्य चरण इस पद में इसी सिद्धान्त का निरूपण कर रहे हैं- गौरी मूल-यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहु कौनें सचु पायौ। जहँ तहँ विपत्ति जार जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ॥ द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परत कौन पै धायौ। कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ॥ (जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ। यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ॥५९॥ [यह पद ओरछे के स्वनाम धन्य पण्डित प्रवर श्री हरिराम जी 'व्यास' के प्रश्न के उत्तर में कहा गया था, जिससे प्रभावित होकर व्यासजी श्री आचार्यपाद के शिष्य हो गये। इसी पर उन्होंने कहा है-श्रीहरिवंश कृपा करी, मिटे व्यास के संस ।।]