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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

हित चौरासी • • १६३ भावार्थ - इस एक मन को बहुत स्थानों पर लगाकर कहो किसने सुख पाया ? उस (बहुत जगह मन को नचाने वाले) को तो जार युवती (व्यभिचारिणी) की भाँति जहाँ तहाँ दुःख ही दुःख है, पिङ्गला वेश्या ने इसका स्पष्ट गान किया है। दो घोड़ों को एक साथ जोड़ कर भला हठ पूर्वक उन दोनों के ऊपर कौन बैठ कर उन्हें दौड़ा सकता है ? तुम्हीं बताओ गणिका से उत्पन्न पुत्र को कौन पिता अपनी गोद में ले (अर्थात् वह किसका पुत्र कहा जाय ?) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा है-असत् है और काल सर्प से ग्रसित है (अर्थात् अवश्य विनाशी है;) ऐसा अपने हृदय में समझ कर मैंने श्रीश्यामा श्याम पद कमल सङ्गी-रसिक भक्त जनों को अपना मस्तक झुका दिया अर्थात् उनके प्रति समर्पण पूर्वक मैंने उनका ही एक मात्र चरणाश्रय ग्रहण किया है। टिप्पणी- "प्रगट पिंगला गायौ" सुख मन की एकाग्रता में है, इधर उधर भटकाने में नहीं। पिङ्गला नाम की वेश्या अमलात्मा ब्रह्म ज्ञानियों की नगरी विदेह नगरी जनक पुर की निवासिनि होकर भी वेश्या वृत्ति से जीवन यापन करती थी। वह अपने सुख रूप आत्म तत्व को न जान कर पर पुरुषों में सुख ढूँढ़ती थी। एक दिन वह व्यभिचारिणी अर्ध रात्रि तक अनेक पुरुषों की प्रतीक्षा करती रही पर उस दिन उसके पास कोई भी न आया, तब वह बहुत दुःखी और निराश हुई। अब उसे अपने सुख रूप आत्मा का ध्यान हुआ। उसने इसी शोक अज्ञान ओर भूल के लिये जो पश्चात्ताप किया है, वह पिङ्गला गीत के नाम से श्रीमद्भागवत में वर्णित है उसे हम यहाँ अविकल रूप में उद्धृत करते हैं उस पिङ्गला ने कहा- अहो मे मोह विततिं पश्यता विजितात्मनः। या कान्तादसत: कामं कामये येन वालिशा।। सन्तं समीपे रमणं रति प्रदं, वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।