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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 275 में से

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पृष्ठ 202

१६६ • • हित चौरासी सकता है ? जिस समय जीव सम्पूर्ण विषयों से उपरत हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपना रक्षक हो जाता है, अतः प्रमाद रहित होकर इस जगत को निरन्तर काल रूपी सर्प से ग्रस्त हुआ देखे।” अस्तु; उक्त उद्धरण में बहुत स्पष्ट है कि पिङ्गला ने अपने मन को अनेकों जारों में लगाकर अशान्त बना डाला और पश्चात् उपरत होकर उसने उस मन को अपने आत्मा में एक जगह स्थिर किया तब सुखी हुई। उसके मन की एकाग्रता ही सुख का कारण बनी। इस एक उदाहरण से प्रत्येक बहुमुखी मन वाले साधक, उपासकों को उपदेश किया गया है जो युगल किशोर किंवा अपने किन्ही भी इष्ट देव की उपासना प्रेम मार्ग से करना चाहते हैं; वे अपने मन को बखेरें नहीं वरं एकत्र करके-सँमेट कर उसे अविचल भाव से अपने प्रभु के चरणों से बाँध दें। (२) टिप्पणी- द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि परत कौन पै धायौ। कहिधौं कौन अंक पर राखै जो गनिका सुत जायौ।। जैसे दो घोड़ों पर कोई एक साथ नहीं बैठ सकता, इसी प्रकार अनेक स्थानों पर मन भी एक साथ नहीं लगाया जा सकता अर्थात् परमार्थ और संसार दोनों एक साथ नहीं हो सकते सादृश्यता से। किसी एक का महत्व तो कम होगा ही। यह संसार और संसार की वस्तुओं में मन का लगाना ही परमार्थ या प्रेम पथ का व्यभिचार है। मन को इस व्यभिचार वृत्ति से निकाल कर एक निष्ठ करना होगा। व्यभिचारी मन गणिका के बेटे की तरह है। गणिका पुत्र किस बाप का बेटा है निश्चित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अनेक देवी देवताओं का उपासक वास्तव में किस एक देवता का है क्या पता? ऐसी दशा में जबकि वह एक साथ अनेकों का है, उसका मन भी अविचल भाव से एक किसी में नहीं लग सकता।

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