हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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हित चौरासी • • १६७ अब विचारणीय यह है कि इस एक मन को अनन्य भावेन कहाँ स्थिर रूप से लगा देना चाहिये और कहाँ नहीं ? दो वस्तुएँ सामने हैं एक काल सर्प ग्रसित संसार और दूसरे नित्य विहारी प्रेम स्वरूप श्रीराधावल्लभ। इसका उत्तर श्रीहिताचार्य पाद इसी पद की अन्तिम दो पङ्क्तियों में दे रहे हैं- हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ। यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ।। श्रीश्यामा श्याम के चरण कमल सङ्गियों का ही सङ्ग करना जीव का परम धर्म है। इसे प्राप्त करके वह मानो श्यामा श्याम का प्रेम पा गया। अतः विश्व प्रपञ्च की स्मृति भुलाकर अनन्य भाव से केवल हित मय श्रीराधा वल्लभलाल का ही हो रहे।
- ६० - अवतरण- श्रीप्रियाजी का रूप सौन्दर्य एक अपार और अथाह सागर है किंवा सुमेरु गिरि है अथवा वह अवर्णनीय वस्तु है जिसका पार कोई और तो कहकर पावेगा ही क्यों स्वयं अखिल लोक नायक, रसिक चूड़ामणि,परात्पर ब्रह्म, अनन्त शक्ति भगवान्-श्रीकृष्ण भी नहीं पा सकते। वे केवल उनके रूप को देखा करते हैं, अनिमेष भाव से चकोरवत् किन्तु तृप्ति होती ही नहीं। वे अनन्त रूप होकर उस मुख माधुरी का पान करना चाहते हैं। वे दर्शन के समय पलकों का गिरना भी सह नहीं सकते, कोटि कोटि कल्पों के समान मानते हैं एक पलक मात्र को। स्वयं श्रीलालजी इस पद में अपने हृदय एवं नेत्रों की प्रेमाकुल, रूपाकुल दशा का वर्णन करते हैं श्रीहिताचार्य पाद के शब्दों में- गौरी मूल-कहा कहौं इन नैननि की बात। ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस अटके अनत न जात।। जब जब रुकत पलक संपुट लट अति आतुर अकुलात। लंपट लव निमेष अंतर ते अलप कलप सत सात।। श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृग मद है न समात। ( जै श्री ) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात।।६०।।