भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 204

१६८ • • हित चौरासी भावार्थ - (श्रीलालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते हैं- "सखी !) मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्रमर श्रीप्रिया मुख कमल के रस में अटक कर अब अन्यत्र कहीं जाते ही नहीं। जब जब कभी ये नयन पलक सम्पुट में अलक लटों के कारण अन्तराय (विक्षेप) प्राप्त करते हैं; तब तब अत्यन्त आतुर होकर घबरा उठते हैं। ये रस लोलुप (नेत्र) लव निमेष काल के अन्तर से भी कम अन्तर को सैकड़ों सैकड़ों कल्पों के समान अनुभव करते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीलालजी के नयन श्रीप्रियाजी के) कानों में कमल (आभूषण बनकर) आँखों में अञ्जन और कुचों के बीच में मृग मद बन कर भी नहीं समाते) अर्थात् शान्ति तो पाते नहीं वरं उनके हृदय में रूप और प्रेम की तृषा बढ़ती ही रहती है।) इसलिये श्याम वपु श्रीलालजी उनकी नाभि सरोवर के जलचर मीन बन जाने की याचना कर रहे हैं; (ताकि निरन्तर मीन वृत्ति से श्रीप्रियाजी का रूप रस पान करने के लिये मिला करे, वह मेरा जीवन ही बन गया।) टिप्पणी-जिस अपार रूप ने श्रीलालजी को परवश कर दिया है, उसकी एक दिशा की ओर श्रीहित ध्रुवदास जी सङ्केत कर रहे हैं; क्योंकि समग्रता से कहने के लिये तो कोई समर्थ ही नहीं। वे कहते हैं- प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधि जाति; प्यारेजू के उर ते न रेखा सी टरति है। भरि भरि आवैं नैन, कैसेहूँ न पावैं चैन; बान की सी अनी हियैं खरक्यौ करति हैं।। लाड़िली नवेली अलबेली खानि माधुरी की; सहज सुभाइनि में सर्वसु हरति है। 'हित ध्रुव' नये नये छवि के तरंग उठैं; रीझि सीस चन्द्रिका जु पगुनु ढरति है। इस अपार रूप को देख देख कर प्रियतम श्याम सुन्दर की क्या दशा हो जाती है वह भी देखिये-