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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

हित चौरासी • • १६६. ज्यों ज्यों लाल देखैं मुख नैननि कौं तृषा होति; प्यारीजू कौ रूप मानौं प्यास ही कौ रूप है। डीठि डीठि रही मिलि जैसें एक धारा ध्रुव; हौंहू भूली देखि दसा अतिही अनूप है॥ कौन रस स्वाद गह्यौ कैसेहूँ न जात कह्यौ; जानत न छाँह अरु कैसी होत धूप है। और सुख जेते सब भये हैं पतंग रस- राज के सुखनि पर प्रेम भान भूप है॥ इसी अनूप रूप पर इस रसोपासना की भिति खड़ी है- नैन पगनि चलिबौ तहाँ जौं ध्रुव बनहि तौ जाइ॥

  • ६१ - अवतरण - आज श्रीश्याम सुन्दर एवं श्रीप्रियाजी अपने समस्त वृन्दावन परिकर सहचरियों के साथ रास क्रीड़ा कर रहे हैं। इन रास परायण श्रीलाल की छबि का ही इस पद में वर्णन है- गौरी मूल-आजु सखी बन में जु बने प्रभु नाचत हैं ब्रज मंडन। वैस किसोर जुवति अंसनु पर दियें विमल भुज दंडन॥ कोंमल कुटिल अलक सुठि सोभित अवलंबित जुग गंडन। मानहु मधुप थकित रस लंपट नील कमल के खंडन॥ हास विलास हरत सबकौ मन काम समूह विहंडन। (जै श्री) हित हरिवंश करत अपनौ जस प्रकट अखिल ब्रह्मंडन॥६१॥ भावार्थ- (श्रीहित अलि ने कहा-)"हे सखी ! आज नव किशोर ब्रज भूषण प्रभु श्रीश्याम सुन्दर तरुणि गणों के कन्धों पर अपने विमल वाहु दण्डों को रखे बन ठन कर वृन्दावन में नाच रहे हैं। उनके दोनों गालों का सहारा लिये कोमल, घुँघराली और काली काली अलकावली बड़ी सुन्दर शोभा पा रही है। (ऐसा ज्ञात होता है) मानो रस लम्पट मधुप गण नील कमल के दलों पर (या कोष पर) लुभा कर अटक गये हैं।"