हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २०३ आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव गृह पति बंधु विसारे। दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे॥ हरषित वदन बंक अवलोकनि सरस मधुर धुनि गावै। मधुमय स्याँम समान अधर धरैं मोहन बैनु बजावै॥ रास रच्यौ बन माँही। विमल कलप तरु छाँहीं॥ विमल कलपतरु तीर सुपेशल सरद रैन वर चंदा। सीतल मंद सुगंध पवन बहै तहाँ खेलत नंद नंदा॥ अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं। जमुना पुलिन रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँही॥ देखत मधुकर केली। मोहे खग मृग बेली॥ मोहे मृगधैनु सहित सुर सुंदरि प्रेम मगन पट छूटे। उडगन चकित थकित ससि मंडल कोटि मदन मन लूटे॥ अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक सचु पावत देखत मधुकर केली॥६३॥ भावार्थ—मोहन मदन का भी संमोहन करने वाले ललित त्रिभङ्गी है, वे मुनियों के भी मन को आनन्दित करने वाले हैं। ये मुनि मन मोहन गोपाल गुणों में गम्भीर और परम आनन्द की प्रकट रूप से श्रेष्ठ घनीभूत मूर्त्ति हैं। अहो ! उनके मस्तक पर किरीट, कानों में मणिमय कुण्डल और वक्षस्थल पर वनमाला शोभित है एवं सुन्दर कटि देश पर मधुर करधनी विराज रही है। कमल जैसे चरणों के नख सूर्यकान्त मणि की भाँति जगमगा रहे हैं, ऐसे सुन्दर हैं ये मोहन मदन त्रिभङ्गी। वे मन मोहन मुग्ध करने वाली वंशी बजा रहे हैं और वंशी के मीठे स्वर से (ब्रज) नारियों को बुला रहे हैं। उस वंशी का मधुर स्वर सुनते ही ब्रज नारियाँ अपने अपने घर, पति, एवं बंधुओं (कुटम्बीजनों) को भूलकर (मोहन के पास) आ गयीं। उन्होंने मनोहर मदन गोपाल का दर्शन करके काम ताप का निवारण किया। (ब्रज बालाओं ने दर्शन किया कि श्याम सुन्दर अपने) प्रसन्न वदन हैं,