हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ • • हित चौरासी अर्थात् “परीक्षित् ! जिन रात्रियों में मल्लिका के फूल खिल उठे थे, शरद् काल की उन श्रेष्ठ रात्रियों को देखकर भगवान् ने भी योगमाया का आश्रय लेकर रमण करने की इच्छा की।” भगवान् के इच्छा करते ही सम्पूर्ण अनुकूल वातावरण तत्काल तैयार हो गया। चन्द्र देव अपनी सुधा रश्मियों से श्रीवन को अनुरञ्जित करते हुए उदित हो आये, जिससे दिशाएँ विदिशाएँ लाल लाल रङ्ग से जगमगा उठी, उस समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह अरुणिम बाल चन्द्र अपनी प्रिया से फाग खेलकर मुख में गुलाल मर्षण किये उठ चला आया है। चन्द्रोदय से वन की समस्त लताएँ, ओषधियाँ वृक्ष, विटप, तरु जीवन-रस पाकर लहलहा उठे, लताएँ फूल गयीं। फूलों से सौरभ उधार लेकर पवन उसे ले चला पर भार अधिक होने से धीरे-धीरे ही चलता रहा। उसने समस्त वन को सौरभ से भर दिया। धीरे धीरे चन्द्र देव गगन में आगे बढ़े। प्रकाश और भी उज्ज्वल धवल हुआ। अब तो मानों उनकी किरण डोरियों से एक रश्मि वितान सा तन गया। तब मन मोहन ने अपनी प्रेम राग-गायिका मनोहर मुरली को अधरों से लगाया। वह अधर सुधा का पान करके मुग्ध कण्ठ से गा उठी मद-विह्वल-कारी मीठी तान। उसे सुना ब्रज की प्रेम मयी बालाओं ने। वे तान की डोर से बँधी श्याम सुन्दर के पास आयीं। फिर आगे क्या क्या हुआ वह सब श्रीहिताचार्य्य चरण बता रहे हैं- गौरी मूल-मोहन मदन त्रिभंगी। मोहन मुनि मन रंगी।। मोहन मुनि सघन प्रगट परमानँद गुन गंभीर गुपाला। सीस किरीट श्रवन मनि कुंडल उर मंडित बन माला।। पीतांबर तन धातु विचित्रित कल किंकिनि कटि चंगी। नख मनि तरनि चरन सरसीरुह मोहन मदन त्रिभंगी।। मोहन बैंनु बजावै। इहिं रव नारि बुलावै।।