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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 275 में से

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पृष्ठ 207

हित चौरासी • • २०१ उस रास को अपने नेत्रों देखकर फूल उठो न-परम प्रसन्न हो जाओ ! उस रास में, सूर्य कन्या यमुना के पुलिन पर अत्यन्त सुन्दर मधुर एवं महा मोहन ध्वनि (कङ्कण किङ्किणि, नूपुर, वंशी, ताल, रबाब, मुरज, मृदङ्ग आदि बाजों की) प्रकट हो रही है। दोनों (दुलहिनि एवं दूलह) के मुखों से 'थेई थेई' वचन उच्चरित होते हैं, उन्हें सुन सुन कर तुम अपनी देह सुधि क्यों नहीं भूल रही हो अर्थात् भूल रही हो, क्योंकि रास अत्युत्तम है न !" (रास नृत्य के समय) "मृदु पद न्यास (पैर पटकने) से केशर की धूल (ऊपर आकाश में) उठ रही है और वायु प्रवाह से वस्त्र भी (किसी रस पूर्ण) अद्भुत गति से फहरा रहे हैं; [ अथवा यमुना के दोनों कूलों में अद्भुत रीति से समीर बह रहा है।] कभी-कभी श्याम श्यामा के अधर, केश, उरोज हार एवं भुजमूल को छू देते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी भाव से) कहते हैं-' 'सखियों! दोनों के अत्यन्त लावण्य रूप अभिनय एवं गुणों की समता में कोटि-कोटि काम भी नहीं हैं।"" (अब श्रीहित सखी युगल किशोर के प्रति कहती हैं) "हे रसिक युगल किशोर ! आप इसी प्रकार अपनी भृकुटियों के नर्तन पूर्वक हास विलास रस का वर्षण करते हुए (सदा) प्रेम रस में झूलिये। – ६३ – अवतरण-श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत रास पञ्चाध्यायी के प्रारम्भिक अध्याय में वर्णन आता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया का आश्रय लेकर रास रसोत्सव करने की इच्छा की। यह उनका आत्म रमण था। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- भगवानपि ता रात्रीः शरदत्फुल्ल मल्लिका। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ श्रीमद्भाग० १०/२९/१

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