हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ • • हित चौरासी भी प्रकाशित न करने की ही आज्ञाएँ सर्वत्र हैं। एक स्थल पर चाचा श्रीहित वृन्दावन दासजी ने आज्ञा दी है- होइ भावना सिद्ध ताहि उर अंतर राखै। मरमी हू सौं बात कछू मित ही की भाखै।। धरमी मरमी बिना कहै तो टोटो परिहै। विमुख करें उपहास चित्त-भावुक जु विगरिहै।। प्रानन प्यारी वस्तु दुरायें डोलैं जतननि। विमुख कूँजरनि हाथ गहावै जनि रस रतननि।। अतः रसिक उपासक का धर्म है कि इस दिव्य रस सार रति विहार का अपने हृदय में अनुभव करके गोप्य ही रखे, बिना अधिकारी के किसी अन्य को इसे न दे, न दे। — ६७ — अवतरण-श्रीहित सजनी अपनी सखियों से परम सौन्दर्यमयी, रूप लावण्यमती श्रीप्रियाजी के नख शिख शृङ्गार का वर्णन करती हैं- कल्याण मूल- रुचिर राजत वधू कानन किसोरी। सरस षोडस कियें, तिलक मृगमद दियें, मृगज लोचन उबटि अंग सिर खोरी।। गंड पंडीर मंडित चिकुर चंद्रिका, मेदिनि कबरि गुंथित सुरंग डोरी। श्रवन ताटंक कै, चिबुक पर बिंदु दै, कसूँभी कंचुकी दुरै उरज फल कोरी।। वलय कंकन दोति, नखन जावक जोति, उदर गुन रेख पट नील कटि थोरी। सुभग जघन स्थली क्वनित किंकिनि भली, कोक संगीत रस सिंधु झक झोरी।।