हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २२१ रस से ओत प्रोत हैं किन्तु इसमें जितने स्पष्ट और सरस रूप से किसी छटा की झाँकी कराई गयी है वह व्यञ्जना बड़ी ही अनोखी और अभूत पूर्व है। इस पद में रस के प्रकाश एवं विकास में श्रीहिताचार्य्य चरण ने जिस कुशल शैली का अनुवर्त्तन किया है वह अद्वितीय है। अस्तु; इसमें वर्णित विषय गोप्य है अतः इसका वर्णन कथन, श्रवण सब कुछ मौन में ही है। यह हृदय में ही अनुभव करने की वस्तु है. श्रीनागरीदासजी कहते हैं- चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन में ही कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। कितनी अटपटी है इस रस की भाषा? मौन में कथन और नयन हैं श्रोता ? जिस प्रकार यह गोप्य है, उसी प्रकार गूढ़ भी इतना है कि इसे प्रकाश करने में श्रोत्रिय और रस निष्ठ सभी महानुभाव असमर्थ हैं, किसी न किसी कारण से। फिर भी कृपालु महानुभावों ने अभिलाषी उपासकों को प्रकाश अवश्य दिया है। श्रीहित ध्रवदासजी ने इस रस विलास की ओर जो इङ्गित किया है उससे इस रस के हृदयङ्गम करने में सहायता मिलेगी अवश्य। वे कहते हैं- प्रेम मदन के सिंधु द्वै बहत रहत दिन हीय। कबहुँ विवस चेतत कबहुँ छिन छिन प्यारी पीय।। छिन छिन प्यारी पीय मधुर रस बिलसत ऐसे। सूच्छम प्रेम की बात कहौ कोऊ बरनै कैसे।। यह सुख सखियन बाँट पर्यौ भूले ध्रुव सब नेम। इक रस फूलीं फिरतिं सँग पाइ माधुरी प्रेम।। अस्तु; इस रस की दुरूहता, गम्भीरता, उत्कृष्ट्ता, अलौकिकता, एवं लोक वेदातीत भावना को लक्ष्य में रखकर प्रकाशन करने में समर्थ रहने पर