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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

२२० • • हित चौरासी उस महामधु का पान करते ही प्रियतम शीघ्रता पूर्वक ऐसे उठ बैठे जैसे मीन को पानी मिल गया हो। (फिर अर्ध चेतन की सी अवस्था में कहने लगे-) "अहो ! अभी अभी तो मैंने अपने मुख के मध्य (किन्हीं) रसमय अधर बिम्बों का अनुभव किया था।" (इतनी स्मृति आते ही) फिर उन्हें पूर्ववत् जागृत की ही भाँति भ्रम हो गया कि मैं श्रीप्रियाजी के आलिङ्गन से वञ्चित हूँ; इसलिए उनका मन पुनः शत-शत कामदेवों के जाल में पड़ गया-वे अधिकाधिक व्यथित हो गये। (मन्मथ-व्यथा से व्यथित होकर श्रीलालजी दीनता पूर्वक श्रीप्रियाजी से विनय सी करने लगे; वे बोले-) "हे सुन्दरि ! आप स्वाभाविक स्नेह के साथ केवल एक ही बार सही अपने अधरों के अमृतका दान मुझे दीजिये ! हे सखि ! अब कृपा पूर्वक आप अपने श्रीचरण कमलों के निवास भवन रूप मेरे इस देह को (कामाग्नि में जलने से) बचाइये- इसका पालन कर लीजिये ?" प्रियतम के इन शब्दों को सुनकर) श्रीप्रियाजी ने कहा-"हे नव निकुञ वर राज ! हे प्रियतम !! तुम तब कहाँ थे ? (जब मैंने अधरामृत दिया था।) अरे रति लम्पट ! अब क्यों व्यर्थ इस (चाटुकारी पूर्ण) वचन रचना का विस्तार कर रहे हो ?" मानिनि प्रिया के मुख से अपने कानों ये शब्द सुनते ही (प्रियतम के) हृदय में धैर्य नहीं रह गया, उनकी बुद्धि कातर हो गयी और विरह जनित दुःख व्याप्त हो गया वे लम्बी लम्बी साँसे लेने लगे। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि श्रीलालजी की ऐसी प्रेम विह्वल दशा देखकर उदार हृदया श्रीप्रियाजी ने उन्हें अपनी भुजलताओं से आकर्षित करके अपने हृदय के बीच ले लिया। उस समय दोनों के मिलन में जो भी कुछ आनन्द उत्पन्न हुआ, (वह अवर्णनीय है, उसका केवल इतने से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि) उस सुख की विस्मृति में सन्ध्या तो त्रुटि लव मात्र समय जैसी हो गयी, (अर्थात् काल जाते पता न लगा और बहुत सा समय बीत कर फिर से दूसरी सन्ध्या आ लगी।) टिप्पणी – यह पद रति विहार भावना का बड़ा ही सूक्ष्म एवं गम्भीर परिचायक है। इसमें वर्णित रस युगल किशोर रसिक सखि गण एवं रसिक उपासक जनों का जीवन प्राण है। यों तो सम्पूर्ण 'हित चौरासी' के पद इसी एक