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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

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हित चौरासी • • २१६ लालन मिस आतुर पिय परसत उरु नाभि उरजात। अद्भुत छटा विलोकि अवनि पर विथकित वेपथ गात॥ नागरि निरखि मदन विष व्यापित दियौ सुधाधर धीर। सत्वर उठे महामधु पीवत मिलत मीन मिव नीर॥ अबहीं मैं मुख मध्य विलोके बिंबाधर सु रसाल। जागृत ज्यौं भ्रम भयौ पर्यौ मन सत मनसिज कुल जाल॥ सकृदपि मयि अधरामृत मुपनय सुंदरि सहज सनेह। तव पद पंकज कौ निजु मंदिर पालय सखि मम देह॥ प्रिया कहति कहु कहाँ हुते पिय नव निकुंज वर राज। सुंदर वचन रचन कत वितरत रति लंपट बिनु काज॥ इतनौ श्रवन सुनत मानिनि मुख अंतर रह्यौ न धीर। मति कातर विरहज दुख व्यापित बहुतर स्वास समीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश भुजनि आकरषे लै राखे उर माँझ। मिथुन मिलत जु कछुक सुख उपज्यों त्रुटि लव मिव भई साँझ॥६६॥ भावार्थ – दोनों प्रियतम (श्रीराधा एवं श्रीलालजी) कुञ्ज में विहार कर रहे हैं; दोनों की देह प्रभा अनुपम गौर एवं श्याम है; (दानों के अनुपम विहार से) वन में सुख पुञ्ज बरस सा रहा है। (युगल क्रीड़ा में) प्रचण्ड काम (मन्मथ) ही अद्भुत खेत (युद्ध का मैदान) है, भूषण ध्वनि ही मानो दुन्दुभि वाद्य हैं। (युगल किशोर के) अङ्ग प्रत्यङ्ग से उत्पन्न कोटि कोटि भावों का प्रकाश ही (दोनों योद्धाओं का) परस्पर जूझना है। भीषण युद्ध से अत्यन्त थकित हो जाने के कारण अवला श्रीप्रियाजी की सुन्दर आँखें नींद से भर गयीं और वे कृशाङ्गी आलस्य से भर प्रियतम की गोद में निः शङ्क भाव से सो गयीं। उस समय प्रेम और दुलार के बहाने प्रेमातुर प्रियतम उनके उरू, नाभि एवं उरोजों का स्पर्श करने लगे। (उस समय प्रियाजी के श्री अङ्गों की छबि देखकर उनका शरीर काँपने लगा और वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। (उनके मूर्च्छित होकर गिरने पर) नागरी श्रीप्रियाजी ने देखा, इनके मदन विष व्याप्त हो गया है, तब उन्होंने (प्रियतम को) अपनी अधर सुधा दी।