हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ • • हित चौरासी ये भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवों के भक्तों के, ज्ञानियों के, योगियों के और चराचर के एकमात्र भजनीय हैं। — ६६ — अवतरण—परम रमणीय एवं सर्वकाल सुखमय किसी एकान्त नव निकुञ्ज मन्दिर में श्रीयुगल किशोर की रस पूर्ण रति क्रीड़ा का प्रारम्भ होने जा रहा है। विहार के अवसर पर अत्यन्त प्रेमातुर श्रीलालजी के हृदय का इस पद में बड़ा ही सरस चित्र अङ्कित है साथ ही साथ उनकी प्रेमाधीनता और रस लोलुप वृत्ति का भी। दूसरे पक्ष में श्रीप्रियाजी की रस रूप गर्वोक्ति, गम्भीरता, कोमलता, उदारता, दान शीलता आदि उत्तम नायिकोचित गुणों का प्रकाश करने वाले भावों का समावेश है। विहार की एक रस धारा में काल का बोध भी न हो पाना त्रुटि मात्र में पुनः सायं काल आ जाना रस विहार अत्यन्त रमणीयता का द्योतक है। सम्पूर्ण पद दिव्य एवं अनिर्वचनीय रसमय भावों और शब्द मणियों से गुम्फित हार की तरह है जो युगल रसिक किशोर का हृदय हार बन रहा है। सुज्ञ रसिक जनों के लिये यह पद कितना मादक है अनुभवी ही जानते हैं। श्रीहित संखीजी साक्षी भाव से दर्शन करतीं और अपनी निकट सखियों को उस केलि का वर्णन करके सुनाती हैं- कल्याण मूल-विहरत दोऊ प्रीतम कुंज। अनुपम गौर स्याम तन सोभा वन वरषत सुख पुंज॥ अद्भुत खेत महा मनमथ कौ दुंदुभि भूषन राव। जूझत सुभट परस्पर अँग अँग उपजत कोटिक भाव॥ भर संग्राम भ्रमित अति अबला निद्रायत कल नैन। पिय के अंक निसंक तंक तन आलस जुत कृत सैन॥