हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २१७ अर्थात् "कुछ भी न चाहने वाले, सब कुछ चाहने वाले, अथवा मोक्ष चाहने वाले उदार बुद्धि व्यक्तियों को चाहिये कि वे (अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिये अन्य किन्हीं देवी देवताओं का यजन न करके) तीक्ष्ण भक्ति योग के द्वारा केवल परम पुरुष (भगवान् श्रीकृष्ण शुद्ध सत्व ब्रह्म) की ही आराधना करें।" परम मुमूर्षु राजा परीक्षित के लिये जीवन के अन्तिम दिनों में गङ्गा तट पर परम हंस शिरोमणि भगवान् शुक देव ने राजा के इस प्रश्न पर कि इस समय मेरा क्या कर्त्तव्य है ? यही उत्तर दिया था- तस्मात्भारत सर्वात्मा भगवान्हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यश्चेच्छता भयम्।। एतावान्सांख्य योगाभ्यां स्वधर्म्म परिनिष्ठया। जन्मलाभः परं पुंसामन्ते नारायण स्मृतिः।। प्रायेण मुनयो राजभिवृता विधिषेधतः। नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः।। श्रीमद्भागवत. २/१/५,६,७ अर्थात् "अतः हे भारत ! जिसे अभय पद की आवश्यकता हो उसे सबके आत्म स्वरूप भगवान् श्रीहरि का ही श्रवण कीर्त्तन और स्मरण करना चाहिये। सांख्य, योग तथा स्वधर्म्म निष्ठा आदि समस्त साधनों से अन्त काल में भगवान् का स्मरण रहे यही मनुष्य जन्म का परम लाभ है। हे राजन् ! जो मुनि जन त्रिगुणातीत भाव में स्थित होकर विधि निषेध मर्यादा से परे हो गये हैं, वे भी प्रायः श्रीहरि के गुण गान में ही रमण करते रहते हैं।" अब जिन भगवान् श्रीकृष्ण के भजन स्मरण और कीर्त्तन के ही लिये सत् शास्त्र आज्ञा देते हैं; वही शास्त्र उनकी सर्वोपरिता का भी निरूपण करते हैं; देखिये- एते चांशकला पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्। श्रीमद्भाग. १/३/२८ अर्थात् "अन्य सभी अवतार आदि तो अंश कलाएँ हैं पर ये श्रीकृष्ण तो परिपूर्णतम् ब्रह्म-भगवान हैं स्वयं भगवान् ! "