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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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२१६ • • हित चौरासी में मृदङ्ग बज रहे हैं और सब (सखियाँ) सुधङ्ग गति से नाच रही हैं क्या तुमने अपने कानों उनका मधुर वंशी वादन नहीं सुना ? श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी भाव से) कह रहे हैं- "हे सखी ! ये प्रभु राधिका रमण-आपके प्रियतम हैं और समस्त विश्व के (प्रेमी) भक्तों के भी भजनीय तत्व हैं। (तुम भले ही मान किये बैठी रहो, जाने तुम्हें ये कैसे लगते हैं पर) मुझे तो ये बहुत अच्छे लगते हैं, (अर्थात् मुझे और समस्त विश्व को ये अच्छे लगते हैं पर तुम्हें नहीं; क्योंकि तुम मान किये बैठी हो। यदि मान का त्याग कर दो तो तुम्हें भी वे अच्छे लगने लगे। वैसे तो सदा ही तुम्हें भी अच्छे लगते हैं पर अभी मान ने इतना अन्तर डाल दिया है। जो मान अपने प्यारे में बुराई का भ्रम उत्पन्न कर दे वह अवश्य और शीघ्र त्याज्य है; अतः आप अब शीघ्र मान का त्याग करके अपने परम प्रियतम से चल कर मिलें।) टिप्पणी— "जगत भगत भजनी" जीवों की रुचियाँ अनेक हैं और विचित्र हैं। इसलिये जीव उन रुचियों के अनुसार विषय, अर्थ, धर्म काम मोक्ष और भक्ति अनेक स्थलों से चिपटा है। उपासना के क्षेत्र में यदि किसी की रुचि, प्रेत, पितृ देवता या ब्रह्मा शिव आदि में है तो रही आवे, अलग बात है, वह तो "ऊधौ ! मन माने की बात !" है पर तत्व विचार या विवेक जन्य निर्णय से पूछा जाय तो यही उत्तर होगा कि जीवों के एकमात्र भजनीय केवल भगवान् श्रीकृष्ण हैं। ये परात्पर ब्रह्म हैं, सर्वेश्वर हैं और जीवों की एक मात्र गति हैं। समस्त जीव इनके सनातन अंश हैं। केवल यही ब्रह्म हैं; शेष इनके अतिरिक्त ब्रह्मा से लेकर स्तम्ब पर्यन्त सब जीव हैं चाहे उनके लिये पुराण और शास्त्रों की रचना ही क्यों न कर डाली गयी हो महत्ता प्रदर्शन के लिये। वेद पुराण एवं समस्त सच्छास्त्रों का यही निर्णीत मत है। प्रत्येक अकामी, सर्वकामी सकामी, एवं मोक्ष कामी के लिये यही भजनीय हैं अन्यत्र देवी देवताओं का भजन व्यर्थ भटकन है। श्रीमद्भागवत इसका निर्णय देता है— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकामो उदार धीः। तीव्रेण भक्ति योगेन यजेतपुरुषः परम्॥ श्रीमद्भा. २/३/१०