भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

हित चौरासी • • २१५ और जब तक इस प्रकार विशाल भाव पूर्ण अनन्यता न होगी तब तक- "पंथ पावनो कठिन है कीन्हें कहा बनाव ?" इस अनन्यता के बिना सारी उपासना, प्रेम, परमार्थ, भक्ति, सभी व्यर्थ हैं दुःख रूप हैं। श्रीभगवत रसिकजी ने कहा है- असन वसन परिवार पुत्र विनु सब जग दुखिया। भगवत रसिक अनन्य विना कोऊ नहिं सुखिया।। इस अनेक वासना रूप दुःखों से मुक्त अनन्य रसिक दासों के लिये ही लीला नट प्रकट है। अतः प्रत्येक को अनन्य भावेन इस लीला नट का चरणाश्रय लेना प्रथम धर्म है। – ६५ – अवतरण-मानवती श्रीप्रियाजी को रासोत्सव में ले चलने के लिये श्रीहित सखीजी उन्हें प्रोत्साहन दे रही हैं। उन्होंने मानिनि से कहा- गौरी मूल-मदन मथन घन निकुंज खेलत हरि, राका रुचिर सरद रजनी। यमुना पुलिन तट सुरतरु के निकट, रचित रास चलि मिलि सजनी।। बाजत मृदु मृदंग नाचत सबै सुधंग; तैं न श्रवन सुन्यौ बैंनु बजनी। (जै श्री) हित हरिवंश प्रभु राधिका रमन, मोकौं भावै माई जगत भगत भजनी।।६५।। भावार्थ – (श्रीहित सजनी ने मानिनि श्रीराधा से कहा- हे मानिनि राधे!) देखो, पूर्ण चन्द्र मयी शरद की रुचिर सुन्दर रात्रि में कामदेव को मथित कर देने वाले श्रीहरि सघन लता भवन में (अलौकिक रास रस) खेल रहे हैं। हे सखी ! यमुना तट-पुलिन पर कल्पवृक्ष के ही निकट श्रीहरि ने रास की रचना की है; तुम भी चलकर उसमें मिलो ! अरी माई ! वहाँ कैसे मधुर-मधुर स्वर