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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

२१४ • • हित चौरासी भगवत रसिक अनन्य कोक उपदेसों सैननिं। बैननि मैंन जगाई रैन दिन देखौं नैननिं।। अनन्य श्रीभगवत रसिकजी अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से सदा, सर्वत्र श्रीकुअ विहारी की केलि का दिव्य रस ही झेलते रहते हैं। यह है रसिकों की रसिक अनन्यता। अनन्यता का स्थूल अर्थ करने वाले लोग जो प्रायः अन्य देवी देवताओं की निन्दा, विरोध, एवं उपेक्षा आदि जो कुछ करते हैं वे अपने प्रभु के व्यापक रूप विस्तार को भूलकर किसी सङ्कीर्ण दायरे में आ जाते हैं। वे श्रीहित ध्रुवदासजी के नीचे लिखे सिद्धान्त को भूल जाते हैं- अपने अपने इष्ट कौं भजहिं जीव ते धन्य। किसी की निन्दा या विरोध करते समय हम अपनी स्थिति से-अनन्यता से उसी क्षण पतित हो जाते हैं जब हमें अपने इष्ट को छोड़कर किसी अन्य की स्मृति भी हो आती है। अनन्यता तो वह है जहाँ उपासक की स्मृति, तन, मन प्राण और आत्मा के कण कण में अपने प्रियतम का रूप समाया रहे इस प्रकार- आओ प्यारे मोहना पलक झाँपि तोहिं लेऊँ। ना मैं देखौं और कौं ना तोहिं देखन देऊँ।। इस अनन्यता की साधना का पथ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद इस तरह बता रहे हैं- स्वान्तर्भाव विरोधिनी व्यवहृतिः सर्वाः शनैस्त्यज्यतां, स्वान्तश्चिन्तित तत्वमेव सततं सर्वत्र संधीयताम्। तद्भावेक्षणतः सदा स्थिरचरेऽन्यादृग्तिरोभाव्यतां, वृन्दारण्य विलासिनो निशि दिवा दास्योत्सवे स्थीयताम्।। अर्थात् “अन्तर्भावों के विरोध करने वाले सभी व्यवहारों को धीरे धीरे त्याग दें, अपने अन्तः करण के नित्य चिन्तनीय तत्व को ही सदा सर्वत्र खोजता रहे। (उसी अन्तः करण चिन्तित तत्व श्रीराधावल्लभलालजी के) भाव को स्थिर चर सब में सर्वत्र देखा करे, अन्य दृष्टियों का ही त्याग कर दे और श्रीवृन्दारण्य विलासी श्रीराधा मुरली मनोहर के दास्य सुख में ही दिन रात लगा रहे।”