हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २१३ जब प्रेमी की दृष्टि में सर्वत्र अपना इष्ट देव ही है तब अन्य है ही कहाँ ? तब उसका विरोध भी किससे और कहाँ रहा ? वह तो सर्वत्र उसे ही देखता है- जहँ देखौं तहँ आपनों इष्ट नाम गुरु धाम। ऐसे दृष्टि प्राप्त महात्मा के लिये विरोध करने के लिये कोई स्थल रह ही नहीं जाता। वह श्रीविहारिन देव जी के शब्दों में कहता है- अब हौं कासौँ बैर करौं। निजु मुख कहत पुकारत प्रभु हैं घट घट हौं विहरौं॥ इसी सर्वत्र इष्ट दर्शन की ऐकान्तिक साधना का मार्ग श्रीहरिराम 'व्यास' इस प्रकार प्रकट करते हैं- जाकी है उपासना, ताही की वासना; ताही कौ नाम रूप लीला गुन गाइये। यहै अनन्य धर्म परपाटी यहै; श्रीवृन्दावन तजि अनत न जाइये।। सोई व्यभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखें दारुन दुख पाइये। 'व्यास' होइ उपहास त्रास कियें आस अछत कत दास कहाइये।। कितना स्पष्ट है इन व्यासजी की अनन्य धर्म परिपाटी ! जिसमें जिसकी उपासना उसी की वासना के साथ उसीके नाम रूप लीला गुणों का गान है। अपनी वस्तु से प्रीति है। अन्य किसी से विरोध का लेश भी नहीं। नित्य विहार का नित्य दर्शन करने वाले, सदा विहार की ऐनक लगाये हुए श्रावण के सूर परम रसिक श्रीभगवत रसिक जी के भी शब्द कुछ ऐसे ही हैं- नैननि देखौं और नहिं, श्रवन सुनौं नहिं और। घाँन न सूघौं और कछु, रसना कहौं न और।। रसना कहौं न और त्वचा परसौँ नहिं औरे। कुंज विहारी केलि झेलि इन्द्रिनु सब ठौरे।।