हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें२५२ • • हित चौरासी सो अनन्य जाके असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप रासि भगवंत॥ समस्त चराचर में भी अपने रूप राशि इष्ट देव का दर्शन करना ही अनन्यता है। यही है अनन्य साधना की सिद्धावस्था, जिसका सङ्केत श्रीहिताचार्य चरण कर रहे हैं- सद्योगीन्द्र सुदृश्य सान्द्र रसदानन्दैक सन्मूर्त्तयः सर्वेप्यद्भुत सन्महिम्नि मधुरे वृंदावने सङ्गताः। ये क्रूरा अपि पापिनो न च सतां सम्भाष्य दृश्याश्च ये; सर्वान्वस्तुतया निरीक्ष्य परम स्वाराध्य बुद्धिर्मम॥ श्रीराधा सुधानिधि २६४ अर्थात् "जिनका सङ्ग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महान् योगीन्द्र गणों के भी लिये सुन्दर दर्शनीय, सघन रसदायी और एकमात्र आनन्द की मूर्तियाँ हैं। उनको वस्तुतया (यथार्थ दृष्टि से) देखकर उनमें मेरी अपनी स्वाराध्य बुद्धि है-वे मेरे लिये इष्टदेव के रूप हैं।" इस अनन्य साधना के दो दृष्टि कोण हैं एक सर्व दर्शन और दूसरा एकान्त दर्शन। ऊपर के प्रसङ्ग में अनन्यता का सर्वदर्शन (अर्थात् सर्वत्र अपने प्रियतम प्रभु का ही दर्शन करना अन्य का न देखना) का दिग्दर्शन कराया गया है अब अनन्यता के एकान्त दर्शन का नीचे के प्रसङ्ग में दिग्दर्शन कराया जाता है जिसका सूत्र श्रीहिताचार्यपाद निर्विरोध भाव से प्रकट करते हैं- रसना कटौ जु अन रटौं निरखि अन फुटौ नैन। श्रवन फुटौ जु अन सुनौं विनु राधा जस बैन॥ अर्थात् "श्रीराधा के सिवाय अन्य कुछ कहने बकने वाली जीभ कट कर गिर जाय, अन्य कुछ देखने वाले नेत्र फूट जायँ, और अन्य कुछ सुनने वाले कान भी फूट जायँ।" यह दृष्टि ऐकान्तिक, एक देशीय किसी एक रूप, नाम के प्रति भी हो सकती है और यही सर्वत्र, सर्व देशीय सब नाम रूपों के प्रति भी हो सकती है।