हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • २११ क्रीड़ा करते रहते हैं। (अतएव निश्चय है,) ये लीला नटवर केवल अपने दासों के रस भजन के लिये ही प्रकट हैं। टिप्पणी- "दास अनन्य" प्रथम एक पद में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने "यह जु एक मन बहुत ठौर करि कहि कौनैं सचु पायौ" इस उपदेश से साधक प्रेमियों के लिये अपने मन को एक जगह लगाने का उपदेश दिया। एक मन को अनेक स्थलों में लगाने से जार युवती (वेश्या) की तरह अशान्ति ही मिलती है शान्ति नहीं; जिसे श्रीराधावल्लभ लाल का एकान्तिक प्रेम इष्ट हो वह नितान्त रूप से अपने मन को एक मुख करे-अनन्य बने। अनन्य का अर्थ है केवल अपने प्रभु का हो रहना और उससे अतिरिक्त सारे विश्व प्रपंच को भूल जाना। अनन्यता में अपने प्रियतम से तल्लीन होने का आदेश निहित है; किन्तु किन्हीं देवी-देवताओं की निन्दा या विरोध का नहीं। यह अनन्यता इतनी एक मेक हो जाय अपने प्रियतम से कि (उससे छान कर न्यारी न किया जा सके) सर्वत्र केवल अपने इष्ट का दर्शन ही हो एवं और कुछ अन्य कहा जाने वाला रह ही न जाय वह बोल उठे- दर दिवार दरपन भये, जित देखौं तित तोहिं। कंकर पत्थर ठीकरी, भये आरसी मोहिं।। अथवा सर्वत्र अपने प्राण प्रियतम श्याम का दर्शन करने वाली गोपियों की भाँति वह अनन्य होकर गा उठे- जित देखौं तित स्याम मयी है। स्याम कुंज बन जमुना स्यामा मनहु स्यामता बेलि बई है।। श्रुति कौ अक्षर स्याम देखियत दीप सिखा पर स्याम तई है। हौं बौरी कै लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है।। चंद्र सार मृग सार स्याम है सब स्याम काम बिजई है। नर देवन की कहा कथा है अलख ब्रह्म छबि स्याम मई है।। अनन्यता का अर्थ बताते हुए इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-